चराचर जगत के सम्पूर्ण देवी-देवताओं, तीर्थराजों, नागों, गन्धर्वों, यक्षों, सिद्धों और योगियों आदि का माह पर्यंत स्नान जप-तप, दान-पुण्य आदि करके तीर्थराज प्रयाग से अपने-अपने लोक के लिए प्रस्थान करने का दिन माघ पूर्णिमा का महापर्व आज यानी, 24 फरवरी शनिवार को मनाया जा रहा है। यह दिन माघ स्नान की अंतिम तिथि है। इस दिन समस्त तीर्थों के अधिपति भगवान विष्णु को सभी देव ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः। कहते हुए प्रणाम करके अपने लोक चले जाएंगे। यहां कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं को भी यही महामंत्र बोलते हुए अपने-अपने स्थाई निवास स्थान के लिए प्रस्थान करना चाहिए।
शास्त्र भी कहते हैं कि- माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्त पापाः त्रिदिवम् प्रयान्ति। अर्थात- माघ में शीतल जल में डुबकी लगाने से मनुष्य पापमुक्त होकर स्वर्गलोग चले जाते हैं। सभी बारह महीनों में केवल माघ का महीना ही ऐसा है जिसमें सूर्य के मकर राशि पर आ जाने से सभी देवी-देवता भी अपना-अपना लोक छोड़कर माहपर्यंत पृथ्वी पर प्रयाग तीर्थ में एकत्रित होकर स्नान, दान-पुण्य आदि करते हैं। माना जाता है कि प्रयाग तीर्थ के संगम तट पर स्वयं देवता भी मनुष्य रूप धारण करके भजन-सत्संग आदि करते हैं और कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन आदि का प्रबंधन भी करते हैं। ये सभी देव अपना-अपना रूप बदलकर परमेश्वर के सत्संग का आनंद भी लेते हैं। इस दिन सभी देव अंतिम बार स्नान करके तीर्थराज प्रयाग का अभिवादन करके अपने-अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप इसी दिन से संगम तट पर गंगा, यमुना एवं सरस्वती की जलराशि का स्तर कम होने लगता है।
सनातन धर्म के सभी श्रद्धालुओं को इस दिन प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, गोदावरी, शिप्रा आदि अनेकों तीर्थों नदियों समुद्रों आदि में प्रातः स्नान, सूर्य अर्घ्य, जप-तप दानादि करने से ब्रह्मचारी, गृहस्त, वानप्रस्थ, संन्यासी, बालक, तरुण, वृद्ध, नपुंसक आदि सभी प्राणीयों को दैहिक, दैविक एवं भौतिक तीनों तापों से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन किया गया सत्कर्म अमोघ फलदाई रहेगा। इस पूर्णिमा के दिन भी सुवर्ण, तिल, कम्बल, पुस्तकें, पंचांग, कपास के वस्त्र और अन्नादि दान करने से सुकृत्य मिलता है।
पूर्णिमा का महत्व कैकेयी पुत्र भरत के इस शपथ से भी ज्ञात होता है कि, जब राम लक्ष्मण माता सीता साहित वन चले गये तो कुछ अवध वासियों ने मां कौशल्या से कहा कि भरत का इसमें हेतु छुपा है। जब भारत ननिहाल से वापस आये तो अपनी माँ कैकयी को कोसते हुये मां कौशल्या से कहा कि माँ भगवान श्रीराम के वनगमन में यदि मेरी किंचितमात्र भी सम्मति रही हो तो देवताओं द्वारा पूजित और अनेकों पुण्यों को प्रदान करने वाली वैशाख, कार्तिक और माघ पूर्णिमाएं मेरे बिना स्नान दानादि ही व्यतीत हों और मुझे निम्नगति प्राप्त हो। इस महान शपथ को सुनते ही प्रेममयी मां कौशल्या ने भरत को गले लगा लिया। सभी भक्तों को इस अक्षुण पुण्यदायक माघ पूर्णिमा के पावनपर्व का लाभ उठाना चाहिए।