मृत्यु किसी भी जीवन का अटल सत्य है। अलग-अलग धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर की अंतिम क्रिया की जाती है। इसके बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार संध्या काल के पश्चात मानव शरीर का अंतिम संस्कार करना वर्जित है। यहां तक कि पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का कार्य भी संध्या काल के पश्चात नहीं किया जाता है। लेकिन जिन तीन स्थानों को 'महाश्मशान' की संज्ञा दी जाती है, उनमें चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार करने की अनुमति धर्मशास्त्रों में दी गई है।
काशी गुरुकुल, वाराणसी के संचालक डॉ. रमाकांत पटेरिया ने अमर उजाला को बताया कि सनातन धर्म के दो ग्रंथों 'गरुड़ पुराण के प्रेत खंड' और 'श्राद्ध प्रकाश' में मनुष्य की मृत्यु और इसके बाद की यात्रा के बारे में विषद व्याख्या की गई है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि संध्या काल के पश्चात अंतिम क्रिया नहीं की जानी चाहिए। यह व्यवस्था सभी श्मशान घाटों के लिए लागू है। अगर रात्रि काल में किसी व्यक्ति का देहावसान हो जाता है, तो भी अंतिम क्रिया के लिए सूर्योदय होने की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।