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गंगा नदी की इन बातों को जानकर आप भी कहेंगे जय मां गंगे

Tue, 07 Jun 2016 01:39 PM IST
साधु ईश्वर समर्पण

सार

  • सात धाराओं में पृथ्वी पर उतरी गंगा
  • शांतनु और गांगेय जल के मिलन को विवाह कहते हैं
  • गंगा इसीलिए जाह्नवी नाम से पुकारी जाती है
  • ऐसी जड़ी-बूटियां जिनके स्पर्श से गंगा का पानी कभी सड़ता नही
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गंगा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पौराणिक प्रतीक कथाओं के साथ इतिहास भी जुड़ा हुआ है जैसे कि शांतनु एक धान्य होता है, आश्विन में उसे वर्षा का जल चाहिए। ऐसा जल ‘गांगेय जल’ कहलाता है। शांतनु और गांगेय जल के मिलन को विवाह कहते हैं। यही रूपक रचा जाकर भारत के इतिहास में मिल गया। उसी प्रकार सागर के साठ हजार पुत्रों का तात्पर्य है, सगर की जनता की संख्या जो अकाल में भूखी-प्यासी मर गई होगी। तब सागर से भगीरथ तथा उनके सहयोगी जनों के कठोर परिश्रम से पर्वतों को काट कर गंगा मैदान में लाई गई होगी। गंगा के उद्गम पर कुछ ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जिनके स्पर्श से गंगा का पानी कभी सड़ता नही।
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हिमालय की अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल है यह

गंगोत्री गंगा
शंकर की जटाओं यानि हिमालय की चोटियां, जो वर्षा के जल से लबालब हैं। उसी अभियंत्रण कला से हिमशिखरों पर अनेक सुंदर और सुदृढ़ सरोवरों का निर्माण हुआ। शिलाओं पर शिला रखकर उनके प्रवाह को भूमि के समतल मैदान की ओर मोड़ा गया। हिमालय की अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल ऐसे ही सरोवर हैं जैसे रूप कुंड से ‘मंदाकिनी’, अनामकुंड से ‘धौली’ गंगा, हेमकुंड से ‘लक्ष्मण गंगा’ ‘गांधी’ सरोवर से ‘मंदाकिनी’ तथा सहस्त्र ताल से पिलंग धारा और भिलंग नदियां जो प्रायः भागीरथी की सहायक नदियां ही हैं।

शिव की जटाओं से मुक्त हो गंगा सात धाराओं में पृथ्वी पर उतरी, जिनमें तीन पूर्व की ओर और तीन पश्चिम की ओर प्रवाहित हुई।सातवीं धारा भागीरथी के पीछे-पीछे आई। मार्ग तय करती हुई जब यह जह्नु ऋषि के आश्रम में पहुंची तो अपने वेग में उसे बहा ले गई। तब देवता, गंधर्वों ने ऋषि की वंदना कर क्षमा मांगी। ऋषि को अपनी जंघा चीरकर गंगा को मुक्त करना पड़ा। गंगा इसीलिए जाह्नवी नाम से पुकारी जाती है।

देवी भागवत पुराण के अनुसार गंगा

वाराणसी - फोटो : अमर उजाला
काशी गंगा के तट पर ही सुशोभित है। कशा यानी चमकने वाला। ‘वरुणा’ और ‘असी’ नामक दो नदियों के आधार पर ही आज इसे वाराणसी संज्ञा प्रदान की गई है। महाभारत में इसे त्रिपथगामिनी, बाल्मीकि रामायण में त्रिपथगा और रघुवंश और शाकुन्तल में जिस्नोता कहा गया है। विष्णु-धर्मोत्तरपुराण में गंगा को त्रिलोक व्यापिनी कहा गया है। शिवस्वरोदय में इड़ा नदी को गंगा कहा गया है।
 
देवी भागवत पुराण के अनुसार गंगा, लक्ष्मी, सरस्वती तीनों विष्णु की पत्नियां थीं। आपसी कलह के कारण सरस्वती और गंगा को पृथ्वी पर नदी के रूप में आना पड़ा। भारतीय संस्कृति के रूप में गंगा का जन्म कैसे भी हुआ हो, पर मनुष्य की पहली बस्ती इसके तट पर आबाद हुई। पामीर के पठारों में गौरवर्णीय सुनहरे बालों वाली आर्य जाति का इष्ट देवता था वरुण। इस जाति की विशेषता थी अमूर्त का चिंतन और खोज। पुरूरवा ने गंगा संगम पर एक बस्ती बसाई, जिसे प्रतिष्ठान का नाम दिया। कहते हैं कि तभी भारतीय संस्कृति की नींव पड़ी।

दशाश्वमेध घाट की ये है कहानी

ganga arti
ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ से संघर्ष करने वाले विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला का विवाह चन्द्रवंशी राजा दुष्यंत से हुआ और उनके पुत्र भरत ने पहली बार इस देश को भारत नाम देकर एक सूत्र में बांधा। सूर्यवंशी भगीरथ ने गंगा के आदि और अंत की खोज की थी। गंगा के तट काशी में जैन तीर्थकंर पार्श्वनाथ का प्रादुर्भाव हुआ तो वहीं सारनाथ में  बुद्ध ने पहला उपदेश दिया।

पाटलिपुत्र में नंद साम्राज्य का उदय हुआ तो चाणक्य ने अर्थशास्त्र की रचना की एवं सम्राट चन्द्रगुप्त के साम्राज्य का निर्माण किया। सम्राट अशोक ने इसी पाटलिपुत्र में अहिंसा और प्रेम के आदेश प्रसारित किए। शुंग के समय अश्वमेध यज्ञ होने लगे। शास्त्र और स्मृतियां रची गईं। रामायण और महाभारत इसी काल में पूर्ण हुए।

महाभाष्यकार पतंजलि भी इसी समय हुए। नागों के राजवंश ने गंगा को अपना राज्य चिन्ह बनाया। दस अश्वमेध यज्ञ किए। दशाश्वमेध घाट इसकी स्मृति का ही प्रतीक है। समुद्रगुप्त की दिग्विजय और चन्द्रगुप्त के पराक्रम के साथ सम्राट हर्षवर्धन ने संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान की।
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इस तरह बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं गंगा

गंगा की सफाई का अभियान तेज - फोटो : Getty
गंगा के तट पर ही राष्ट्रकूट वंश के ध्रुव ने फिर से इन प्रदेशों को जीत कर गंगा को अपना राज चिन्ह बनाया। अबुलफजल, इब्नेबतूता,  बर्नियर, महर्षि चरक, बाणभट्ट आदि मनीषियों को भी गंगा तट पर रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

गंगा के अंचल में ही आयुर्वेद का जन्म। गंगा यदि न होती तो प्राकृतिक दृष्टि से उतर प्रदेश एक विशाल मरूस्थल हुआ होता। राम की सरयू, कृष्ण की यमुना, रति देव की चंबल, गजग्राह की सोन, नेपाल की कोसी, गण्डक और तिब्बत से आने वाली ब्रह्मपुत्र सभी को अपने में समेटती हुई और अलकनंदा, जाहन्वी, भागीरथी, हुगली, पदमा, मेघना आदि विभिन्न नामों से जानी जाने वाली गंगा अंत में सुंदरवन के पास बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं।
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