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जीते जी धन लाभ और मरने के बाद प्रेत योनी से बचाती है यह एकादशी

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पूरे साल में होने वाली 24 एकादशी में जेष्ठ मास की कृष्णपक्ष की एकादशी का बड़ा महत्व है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी के व्रत पूजन से मनुष्य को प्रेत यानी में जाकर कष्ट नहीं भोगना पड़ता है।
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इतना ही नहीं अगर कोई प्रेत योनी में चला गया है तो उसे इस एकादशी का पुण्य देने से प्रेत योनी में गया व्यक्ति भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। मुक्ति प्रदान करने वाली इस एकादशी का नाम अचला है। इसे अपरा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

पद्मपुराण के अनुसार इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण के साथ उनके बड़े भाई बलदेव जी की पूजा करनी चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति इस दिन व्रत रखकर कृष्ण और बलदेव जी की पूजा करता है उसे अपने जीवन काल में किए कई भयंकर पापों से भी मुक्ति मिल जाती है।
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जिन्हें एकादशी व्रत के कारण मिली प्रेत योनी से मुक्ति

अपरा एकादशी व्रत के विषय में कथा है कि प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। इनके छोटा भाई वज्रध्वज जो पापी और अधर्मी था। इसने एक एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। इसके बाद महीध्वज के मृत शरीर को जंगल में ले जाकर पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया।

अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत यानि में जाना पड़ा। राजा प्रेत रुप में पीपल पर रहने लगा और उस रास्ते से आने जाने वालों को परेशान करने लगा। एक दिन सौभाग्य से उस रास्ते धौम्य नामक ॠषि गुजरे। ऋषि ने जब प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से सब हाल जान लिया।

ॠषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का विचार किया और प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। संयोग से उस समय ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि भी थी। ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और एकदशी के पुण्य को राजा को अर्पित कर दिया। इस पुण्य से राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया और दिव्य देह धारण करके स्वर्ग चला गया।
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अपरा एकादशी व्रत के ये हैं पुण्य लाभ

पद्मपुराण में भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से बताया है कि अपरा एकादशी के व्रत से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस एकादशी के व्रत का पुण्य ऐसा है कि इसकी कथा मात्र पढ़ने सुनने से एक हजार गाएं दान करने से पुण्य प्राप्त हो जाता है।

माघ के महीने प्रयाग स्नान का, शिवरात्रि में काशी में रहकर व्रत करने का, बद्रीनाथ केदारनाथ और सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान का जो महापुण्य होता है वह पुण्य सिर्फ अपरा एकादशी का व्रत करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं उनके लिए नियम यह है कि दशमी तिथि से ही अपना आचरण और व्यवहार शुद्घ रखें। एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के संग बलदेव जी की पूजा करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। इस दिन विष्णु पुराण और पद्मपुराण पाठ करने से भी बड़ा लाभ मिलता है।
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