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जन्मदिन तिथि के अनुसार ही क्यों मनाएं ? क्या कहते हैं इस बारे में हिंदू धर्मशास्त्र

Sun, 24 Oct 2021 12:08 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

समाज में अधिकतर परिवार किसी न किसी सदस्य का जन्मदिन अवश्य मनाते है परन्तु उसे मनाने की पद्धति का स्वरुप पाश्चात्य होने के कारण हमें आध्यात्मिक दृष्टि से कोई फायदा तो नहीं होता, लेकिन उसका नुकसान हमें अवश्य होता है।
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भारतीय संस्कृति अनुसार जन्मदिन मनाएं - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिंदू धर्म में प्रत्येक कृति आनंद प्राप्ति के लिए की जाती है। प्रत्येक कृति करते समय उसे ईश्वर के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है, यह हमारे ऋषि मुनियों की अद्वितीय देन है। हिंदू धर्म धार्मिक कृतियों के साथ साथ सामाजिक कृतियों के माध्यम से भी ईश्वर से अनुसन्धान रखना सिखाता है। यही हिंदू धर्म की विशेषता है। समाज में अधिकतर परिवार किसी न किसी सदस्य का जन्मदिन अवश्य मनाते है परन्तु उसे मनाने की पद्धति का स्वरुप पाश्चात्य होने के कारण हमें आध्यात्मिक दृष्टि से कोई फायदा तो नहीं होता, लेकिन उसका नुकसान हमें अवश्य होता है। आज के इस लेख में हम भारतीय संस्कृति के अनुसार जन्मदिन क्यों मनाया जाना चाहिए इस विषय पर जानकारी प्राप्त करेंगे।
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1. भारतीय संस्कृति अनुसार जन्मदिन मनाएं - आजकल हिंदू, पश्चिमी संस्कृति के समक्ष घुटने टेक रहे हैं। परिणाम स्वरूप हमारी धार्मिक कृतियों पर पश्चिमी संस्कृति का अत्यधिक प्रभाव पडा है। ऐसी कृतियों से ईश्वरीय चैतन्य तो प्राप्त नहीं होता, साथ ही ये कृतियां आध्यात्मिक दृष्टि से हानिकारक होती हैं।

आध्यात्मिक अर्थ- जन्मदिन अर्थात जीव की आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति। जीव की निर्मिति से ही उसकी आध्यात्मिक उन्नति आरंभ होती है। यद्यपि जीव प्रत्यक्ष साधना नहीं कर रहा हो, तब भी उस पर किए गए संस्कारों के कारण उसकी सात्त्विकता में वृद्धि होती है तथा उसकी आध्यात्मिक उन्नति आरंभ होती है।
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2. जन्मदिन तिथि के अनुसार मनाने का महत्त्व :

जन्मदिन तिथि का महत्त्व - जिस तिथि पर हमारा जन्म होता है, उस तिथि के स्पन्दन हमारे स्पन्दनों से सर्वाधिक मेल खाते हैं। इसलिए उस तिथि पर परिजनों एवं हितचिन्तकों द्वारा हमें दी गई शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद सर्वाधिक फलित होते हैं इसलिए जन्मदिन तिथिनुसार मनाना चाहिए।

जीवन में बाधाओं के विरुद्ध संघर्ष करने की क्षमता प्राप्त होना - जन्मदिन पर (तिथि पर) ब्रह्माण्ड में कार्यरत तरंगें जीव की प्रकृति एवं प्रवृत्ति के लिए पोषक होती हैं तथा उस तिथि पर की गई सात्त्विक एवं चैतन्यात्मक कृतियां जीव के अन्तर्मन पर गहरा संस्कार अंकित करने में सहायक होती हैं। इस कारण जीव के आगामी जीवन क्रम को आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है और जीवन में आने वाली बाधाओं के विरुद्ध संघर्ष करने की क्षमता उसे प्राप्त होती है।

तिथि के अनुसार जन्मदिन मनाने की पद्धति 

1. जन्मदिन पर अभ्यंग स्नान कर नए वस्त्र पहनें- जन्मदिन पर अभ्यंग स्नान वस्त्र पहने हुए ही करें। स्नान करते समय ऐसा भाव रखें कि, स्नान का जल निर्मल व शुद्ध गंगा के रूप में हमारे शरीर पर प्रवाहित हो रहा है और उससे हमारे देह एवं अंत:करण की शुद्धि हो रही है। स्नान के पश्चात नए वस्त्र धारण करें। उसके उपरान्त माता-पिता एवं अन्य ज्येष्ठ व्यक्तियों को प्रणाम करें। ज्येष्ठों के प्रति आदर भाव उत्पन्न होने से उसके मन की मलिनता नष्ट होती है। इसके उपरांत कुलदेवता का अभिषेक करें अथवा उनकी भावपूर्ण पूजा करें एवं संभव हो तो उनका अभिषेक करें। उपरांत कुलदेवता का कम से कम तीन माला नामजप करें।

2. जिसका जन्मदिन है उसकी आरती उतारें। (उसकी घी के दीप से आरती उतारें)-  जिसका जन्म दिन है, उसका औक्षण करें। औक्षण करवाने वाला एवं करने वाला, दोनों में यह भाव रहे कि, एक दूसरे के माध्यम से प्रत्यक्ष ईश्वर ही यह कृति स्वरूप कार्य द्वारा हमें आशीर्वाद दे रहे हैं। कुलदेवता अथवा उपास्य देवता का स्मरण कर अक्षत तीन बार जीव के सिर पर डालें। जिसका जन्मदिन है उसे मिठाई अथवा कोई मीठा पदार्थ खिलाएं। उसकी मंगलकामना के लिए प्रार्थना करें। उसे कुछ भेंट वस्तु दें; परंतु वह देते समय अपेक्षा अथवा कर्तापन न लें।

3. भेंट वस्तु स्वीकारते समय यह ईश्वर से मिला हुआ प्रसाद है ऐसा भाव रखें - जिसका जन्मदिन है,उसे कुछ भेंट वस्तु देनी चाहिए। इस विषय में आगे दिए अनुसार दृष्टिकोण रखें। छोटे बालक को प्रोत्साहित करने के लिए भेंट दें, बडों को भेंट देने में कर्त्तापन न रखें। अपेक्षा रहित दान करने से हम कुछ कालोपरांत उसके बारे में भूल भी जाते हैं। दान के विषय में कर्त्तापन अथवा अपेक्षा रखने से लेन-देन का हिसाब निर्माण होता है। दान अथवा भेंट स्वीकारने वाला व्यक्ति यदि ऐसा भाव रखे कि,यह ईश्वर कृपा से मिला प्रसाद है तो लेन-देन का हिसाब निर्माण नहीं होता। जन्मदिन पर जिन वस्त्रों को धारण कर स्नान किया जाता है, उन वस्त्रों का स्वयं उपयोग न कर अपेक्षा रहित किसी को दान देना चाहिए।
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जन्मदिन पर कुछ निषिद्ध कृतियां व उनका आधारभूत शास्त्र

1. शास्त्रों के अनुसार कुछ निषिद्ध कृतियां- जन्मदिन पर नाखून एवं बाल काटना, वाहन से यात्रा करना, कलह, हिंसा धर्म, अभक्ष्य भक्षण (न खाने योग्य पदार्थ खाना), अपेयपान (न पीने योग्य पदार्थ पीना), स्त्री संसर्ग (स्त्री के साथ शारीरिक संबंध) इत्यादि कृतियों से प्रयत्नपूर्वक बचें।

2. जन्मदिन पर प्रज्वलित किए गए दीपक को न बुझाएं- प्रज्वलित दीपक का बुझना आकस्मिक मृत्यु, अर्थात् अपमृत्यु से संबंधित है, इसलिए इसे अशुभ माना गया है।

3. जन्मदिन की शुभकामनाएं रात्रि के 12 बजे न देकर सूर्योदय उपरांत देना- पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर अनेक लोग जन्मदिन की शुभकामनाएं रात्रि 12 बजे देते हैं। रात्रि के 12 बजे वातावरण में रज-तम कणों की मात्रा अधिक होती है, इसलिए उस समय दी गई शुभकामनाएं फलदायी नहीं होती हैं। हिंदू संस्कृति के अनुसार दिन सूर्योदय से आरंभ होता है। यह समय ऋषि-मुनियों की साधना का समय है, इसलिए वातावरण में सात्त्विकता अधिक होती है और सूर्योदय के पश्चात् दी गई शुभकामनाएं फलदायी सिद्ध होती हैं। अत: जन्मदिन की शुभकामनाएं सूर्योदय के पश्चात् ही दें।

4. मोमबत्ती जलाकर जन्म दिन न मनाएं - पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर अनेक लोग मोमबत्तियां जलाकर और केक काटकर जन्मदिन मनाते हैं। मोमबत्ती तमोगुणी होती है, उसे जलाने से कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं। उसी प्रकार हिंदू धर्म में ज्योत बुझाने की कृति अशुभ एवं त्यागने योग्य मानी गई है। इसलिए जन्मदिन पर मोमबत्ती जलाने के उपरांत उसे जानबूझ कर न बुझाएं।

5. केक काटकर जन्मदिन न मनाएं- केक पर छुरी चलाना अशुभ क्रिया का प्रतीक है। इसलिए जन्मदिन के शुभ अवसर पर ऐसी कृति से आगे की पीढ़ी पर कुसंस्कार आते हैं। आरती के पश्चात आकृष्ट ईश्वरीय चैतन्य को ग्रहण करते समय ऐसे विधि कर्म करना, उस चैतन्य में कष्टदायक स्पंदनों द्वारा बाधा उत्पन्न करने के समान है। किसी भी शुभ अवसर पर जानबूझ कर इस प्रकार की लयकारी विधि करना धर्म विघातक प्रवृत्ति का लक्षण है।

6. संतों का जन्मदिन- संतों का जन्मदिन उनकी जन्मतिथि पर न मनाएं, जिस दिन उन्हें गुरु प्राप्ति हुई हो उस दिन मनाएं, क्योंकि उस दिन एक प्रकार से उनका पुनर्जन्म होता है। वह दिन प्रकटदिन के रूप में मनाया जाता है।

संदर्भ : सनातन संस्था का  ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक कृतियों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’ 
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