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बेटी से बनाया नाजायज रिश्ता, प्रेत बनकर लिया बदला

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कहते हैं कि मरते समय व्यक्ति की कोई इच्छा प्रबल रहती है तो उसे मुक्ति नहीं मिल पाती है। व्यक्ति अपनी उस इच्छा को किसी न किसी रुप में जरुर पूरा करता है। इसके लिए चाहे उसे पुनर्जन्म लेना पड़े या किसी पशु-पक्षी या प्रेत योनी में ही क्यों न जाना पड़े।
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यह कहानी भी एक ऐसे ही व्यक्ति की है जो अपनी बेटी के साथ हुए धोखे का सदमा सह नहीं सका और बेटी के गम में मर गया। मरने के बाद भी इस व्यक्ति की आत्मा को शांति नहीं मिली। बदले की भावना लिए मरने के कारण यमराज ने इसे नर्क में डाल दिया।

लेकिन नर्क की यातना भी इसके बदले की आग को शांत नहीं कर पाई। नर्क से निकलने के बाद भी जब बदले की भावना नहीं गई तो इसे प्रेत योनी में जाना पड़ा और प्रेत बनकर इसने उस साधु से बदला लिया जिसने इसकी बेटी की जिंदगी खराब की थी।
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पूर्वजन्म में क्या था वह प्रेत?

पूर्वजन्म में प्रेत का नाम सुलेमान था। यह ईरान से भारत आया था और यहीं बस गया। इसने सहारनपुर के मुगलखेड़ा गांव में एक हिंदुस्तानी महिला से विवाह कर लिया। इसके चार बच्चे थे जिनमें बड़ी लड़की थी।

यह लड़की बहुत ही खूबसूरत थी। इसके घर के सामने ही एक गंडे, ताबीज बेचने वाला एक साधु रहा करता था।

इस साधु ने सुलेमान की बेटी को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उससे नजायज रिश्ता बना लिया। सुलेमान ने इस रिश्ते को खत्म करने की काफी कोशिश की लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका।

इस बात का सुलेमान के दिल पर गहरा आघात हुआ और वह इस सदमे से मर गया। आखिरी वक्त में सुलेमान साधु से किसी तरह बदला लेने की दुआ मांगता रहा।
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इस तरह सुलेमान का बदला पूरा हुआ

प्रेत योनी मिलने के बाद सुलेमान मुगलखेड़ा में अपनी कब्र पर आकर रहने लगा। प्रेत योनी में इसे एक हजार साल तक रहने की सजा मिली थी। जब सजा समाप्त होने के कुछ समय शेष रह गए थे उसी दौरान एक दिन पूर्व जन्म में जिस साधु ने सुलेमान की बेटी के साथ नाजायज रिश्ता बना लिया था वह सुलेमान को दिख गया।

अब उस साधु ने मोहनसिंह नाम के व्यक्ति के रुप में दूसरा जन्म लिया था। सुलेमान ने मोहनसिंह के शरीर में साधु की आत्मा को पहचान लिया और इसके शरीर में प्रवेश कर गया।

करीब सात साल तक मोहनसिंह के शरीर में रहकर सुलेमान ने उसे तरह-तरह से कष्ट पहुंचाया। इसके बाद मोहन सिंह को सिखों के पूज्य संत राड़ेवाले श्रीईश्वरसिंह जी के पास लाया गया। यहां मोहनसिंह को सुलेमान के प्रेत से मुक्त कराया गया।

मोहनसिंह को जब प्रेत के कब्जे से मुक्त कराने के लिए संत राड़ेवाले के पास लाया गया था उसी समय सुलेमान के प्रेत ने अपने पूर्वजन्म और नर्क की यतानाओं के बारे में बताया था। यह घटना 1968 की है जिसका उल्लेख परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएं नामक पुस्तक में किया गया है।
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