पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख पर्वों में से एक सूर्य षष्ठी का महापर्व आज है। संतान की अकाल मृत्यु न हो, उनकी आयु लंबी और आरोग्यवान हो इसी के लिए यह महापर्व मनाया जाता है। जगतात्मा सूर्य का पूजन तो आदिकाल से ही होता आ रहा है। इनके सहयोग के बगैर सृष्टि विस्तार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सूर्य पूजन का सर्वाधिक प्राचीन प्रमाण लगभग एक करोड उनत्तीस लाख वर्ष पहले का मिलता है। उस समय सूर्य के सबसे बड़े आराधक वर्त्तमान समय में चल रहे श्रीश्वेतवाराहकल्प के 'वैवस्वत मन्वंतर' के मध्य पचीसवें सतयुग के आरम्भ में है। हय वंशीय महान चक्रवर्ती राजा 'कृतवीर्य' ने किया था। इन्होंने पृथ्वी पर सतहत्तर हजार वर्षों तक राज किया। उस समय च्यवनऋषि के श्राप के कारण इनके यहां जन्म लेने वाले एक-एक करके सौ पुत्र मृत्यु का ग्रास बन गए। जब उनके घर 'सहस्रबाहू' ने पुत्ररूप में जन्म लिया तब राजा कृतवीर्य ने व्रत रखकर सहस्रों किरणों वाले भगवान भास्कर का वेद मंत्रों और सूक्तों द्वारा पूजन-स्तवन किया। निवेदन किया की मेरे पुत्र की दीर्घ आयु हो तो मैं विशेष स्नान अर्घ्य पूजन आदि का विधान करूंगा और राजा ने वह व्रत निर्बाध रूप से संपन्न भी किया।
व्रत से प्रसन्न भगवान सूर्य प्रकट हुए और राजा कृतवीर्य के पुत्र सहस्रबाहू को लंबी आयु का वरदान दिया। कृतवीर्य के निवेदन पर सूर्य ने इन्हें सम्पूर्ण दोषों को विनष्ट तथा महा पापों को शांत करने वाले सप्तमी व्रत का विधान भी बताया। जिस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता हो, जिनके बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु का ग्रास बन जाते हों, उन सभी स्त्रियों को सूर्य की आराधना इन कष्टों से छुटकारा दिला देगी। तभी से लेकर आज तक सूर्य की आराधना हर युग में निरंतर होती आ रही है। इनकी आराधना-व्रत बालक, वृद्ध तथा रोगी सबके लिए अमोघ फलदायी है।
शास्त्र भी कहते हैं कि 'ब्रह्मा विष्णुः शिवः शक्तिः देव देवो मुनीश्वराः। ध्यायन्ति भास्करंदेवं शाक्षीभूतं जगत्त्रये।। अर्थात- तीनों प्रकार श्रेष्ठ, मध्यम और अधम जगत के शाक्षी ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवी, देव, श्रेष्ट इंद्र और मुनीश्वर भी भगवान भास्कर ही ध्यान करते हैं। सूर्य का स्तवन करते हुए सभी कहते हैं कि, आप ही ब्रह्मा, विष्णु ,शिव, प्रजापति अग्नि तथा वषट्कार स्वरुप कहे जाते है आप समस्त संसार के शुभ-अशुभ कर्मों के दृष्टा हैं। प्रतिदिन स्नान के उपरान्त इस मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दें।
षष्ठी पूजा विधि
'सूर्यदेव महाभाग त्र्यलोक्य तिमिरापः। मम पूर्वकृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वरः।। या ॐ नमः खखोल्काय" मंत्र पढ़ते हुए से अर्घ्य दें। भविष्य पुराण के अनुसार इस व्रत को करने वाले पुरुष/स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना चाहिए। षष्ठी को निर्जल/उपवास रहकर व्रत पूजन करना चाहिए। इस दिन सूर्यदेव को विविध भोज्यपदार्थों तथा इस ऋतु में उत्पन्न सभी शाक आदि भोज्य पदार्थ जो भी उपलब्ध हो उसे अर्पण करते हुए शायं कालीन प्रदोष वेला में अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देना चाहिए। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करके सूर्योदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए। इस प्रकार सूर्य की आराधना से प्राणी सभी पापों से मुक्त होकर धन-धान्य पुत्रों सहित पृथ्वी पर निष्कंटक राज करता है।