आस्था का पर्व छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड के लोगों द्वारा बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है लेकिन देश से लेकर विदेशों तक लोगों में छठ के प्रति आस्था देखने को मिलती है। हर साल कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ का व्रत किया जाता है। इस बार छठ का व्रत 10 नवंबर दिन बुधवार को किया जाएगा। छठ का महापर्व पूरे चार दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत चतुर्थी तिथि नहाय-खाय से हो जाती है और सप्तमी तिथि को उगते सूरज को जल देने के बाद व्रत पारण किया जाता है। इस व्रत को संतान की लंबी आयु, अच्छी फसल व सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। छठ में लोग लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं और सुबह शाम कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसलिए छठ को अत्यंत कठिन व्रत माना गया है। इस व्रत में किसी प्रकार से मूर्ति पूजा नहीं की जाती है। छठ सूर्य की उपासना का अनुपम पर्व है। तो चलिए जानते हैं छठ का महत्व, तिथि और इतिहास।
छठ पर्व की तारीखें-
छठ का आरंभ 08 नवंबर 2021 दिन सोमवार, नहाय-खाय से हो रहा है। 09 नवंबर 2021 दिन मंगलवार को खरना किया जाएगा और अस्ताचलगामी सूर्य को छठ का प्रथम अर्घ्य दिया जाएगा। 10 नवंबर 2021 दिन बुधवार को कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर छठ का मुख्य पूजन है। 11 नवंबर 2021 दिन बृहस्पतिवार को सप्तमी तिथि में उगते सूर्य को छठ का अंतिम अर्घ्य दिया जाएगा।
छठ पर्व का इतिहास-
छठ पर्व को अत्यंत प्राचीन माना गया है। इसकी शुरुआत वैदिक काल से ही मानी जाती है। जिस प्रकार से ॠषियों द्वारा ब्रह्म मुहूर्त और संध्या काल गोधूलि बेला में पूजन किया जाता था, छठ पर्व भी उसी प्रकार प्रातः और संध्या समय में पूजन किया जाता है। इसके अलावा ऋषि-मुनियों के द्वारा लिखी गई ऋग्वेद सूर्य पूजन, उषा पूजन का जिक्र मिलता है। इस पर्व को भगवान सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित किया जाता है। छठ पर्व में वैदिक आर्य संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। छठ पूजा का बहुत महत्व माना जाता है।
कथा के मुताबिक छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल के समय में हुआ था। कहा जाता है कि इस पर्व की शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य पूजा करते थे एवं उनको अर्घ्य देते थे। इसलिए आज भी छठ में सूर्य को अर्घ्य देने परंपरा चली आ रही है। इस संबंध में एक और कथा और मिलती है जिसके अनुसार, जब पांडव अपना सारा राज-पाठ कौरवों से जुए में हार गए, तब दौपदी ने छठ व्रत किया था। इस व्रत से पांडवों को उनका पूरा राजपाठ वापस मिल गया था।