गेयटी में पारंपरिक ऊनी वस्त्रों की प्रदर्शनी शुरू, एक शॉल बनाने में लग जाता है एक माह
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20 हजार रुपये की है एक पश्मीना शॉल
याक और खरगोश की ऊन से बने उत्पाद भी उपलब्ध संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। गेयटी थियेटर में शुक्रवार को हिमाचल की पारंपरिक बुनाई कला और हस्तशिल्प समर्पित प्रदर्शनी शुरू हो गई। प्रदर्शनी में कुल्लू, चंबा, किन्नौरी, लद्दाखी और नूरपुरी शॉलों के साथ स्टॉल, मफलर, ऊनी सूट, पश्मीना, याक वूल, रैबिट वूल (खरगोश की ऊन) से बने उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।
इसमें 20 हजार रुपये में बिक रही किन्नौरी पश्मीना शॉल लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस एक शॉल को बनाने में कारीगरों को 3 माह का समय लगता। इस पर ब्रगी कलाकृति है जिसे दो धागों को बुनकर बनाया गया है। उत्पादों की खासियत यह है कि सभी वस्तुएं बुनकरों ने हाथ से तैयार की है, जिससे उनकी मौलिकता और गुणवत्ता बरकरार रहती है। प्रदर्शनी में शॉल और अन्य ऊनी वस्त्रों की कीमत 200 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक रखी है। यह आयोजन मनाली आर्टिजन्स वेलफेयर फेडरेशन कुल्लू ने किया है। इसमें कुल्लू घाटी के स्वयं सहायता समूहों के तैयार किए गए उत्पाद प्रदर्शित किए जा रहे हैं।
प्रदर्शनी 2 नवंबर तक चलेगी और इसमें प्रवेश पूरी तरह निशुल्क रखा है। आयोजकों ने बताया कि इस मेले में आने वाले ग्राहकों को सभी उत्पादों पर 20 प्रतिशत की विशेष छूट दी जा रही है। इससे लोगों को सर्दियों के मौसम से पहले बेहतरीन हिमाचली ऊनी उत्पाद कम दरों पर खरीदने का अवसर मिल रहा है। फेडरेशन के भार चंद ने बताया कि प्रदर्शनी का उद्देश्य स्थानीय बुनकरों को बाजार उपलब्ध करवाना और उनकी पारंपरिक कला को नई पहचान दिलाना है। हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई परिवार आज भी पारंपरिक बुनाई पर निर्भर हैं और ऐसे आयोजन उन्हें आर्थिक सहारा देने के साथ उनके शिल्प को बढ़ावा देने का माध्यम बनते हैं। गेयटी थियेटर में यह प्रदर्शनी हर दिन सुबह से शाम तक खुली रहेगी। आयोजकों ने स्थानीय लोगों और पर्यटकों से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर हिमाचली शिल्पकारों का उत्साह बढ़ाने की अपील की है।