किराये के भवन में चल रहे प्रदेश के इकलौते केंद्रीय राज्य पुस्तकालय का करोड़ों रुपये का बजट लैप्स हो गया है। रखरखाव के लिए राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन (आरआरएलएफ) की ओर से जारी राशि का इस्तेमाल नहीं हो पाया है। इस राशि को वापस लौटाना होगा। आरआरएलएफ की ओर से तमाम केंद्रीय पुस्तकालय के साथ ही प्रदेश के हिस्से भी सवा दो करोड़ का बजट आया था।
इसका इस्तेमाल पुस्तकालय प्रबंधन सिर्फ अपने भवन के रखरखाव पर ही खर्च कर सकता है। सोलन के पास अपना ऐसा फिलहाल कोई भवन नहीं है। देश भर में केंद्रीय पुस्तकालयों का जिम्मा देख रहे आरआरएलएफ ने कुल 35 केंद्रीय पुस्तकालयों को 2.25 करोड़ प्रति पुस्तकालय के हिसाब से जारी किए थे। यह बजट केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से जारी किया गया था। इसमें पुस्तकालय भवन में पुस्तकें रखने, छात्रों के बैठने, भवन की मरम्मत समेत अन्य कार्य शामिल किए हैं।
प्रदेश का केंद्रीय पुस्तकालय सोलन में 1958 में स्थापित किया था। यहीं से प्रदेश के पुस्तकालयों की देखरेख होती है और उन्हें पुस्तकें सप्लाई की जाती हैं। पुस्तकालय की शुरुआत करते समय मालरोड पर किराये का भवन लिया गया था, लेकिन 60 साल बाद भी प्रदेश स्तरीय इस पुस्तकालय के हिस्से अभी तक अपना भवन नहीं आया है। ऐसे में केंद्र से आने वाले किसी भी तरह के बजट का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
केंद्रीय पुस्तकालय भवन की दीवारें जर्जर होने लगी हैं। प्रदेश भर में सप्लाई होने के लिए सप्ताह में करीब एक बार किताबों से भरी गाड़ी पुस्तकालय भवन में खाली होती है। इसके बाद इन पुस्तकों को रखने के लिए जगह नहीं मिल पाती। आलम यह है कि एक तरफ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं तो दूसरी तरफ किताबों के पहाड़ कमरों में लदे पड़े हैं। पुराने भवन पर पुस्तकों का बोझ अब भारी दिखने लगा है।
केंद्रीय पुस्तकालय का वर्ष 2016-17 में मिले सवा दो करोड़ का बजट भी लैप्स हो चुका है। उस समय भी बजट को पुस्तकालय के अपने भवन पर खर्च करने की नसीहत दी थी। साल भर पुस्तकालय प्रबंधन नए भवन का प्रबंध नहीं कर पाया। इस वजह से यह धनराशि वापस लौटानी पड़ी थी।
डीसी विनोद कुमार ने कहा कि शिक्षा विभाग जगह का चयन कर प्रस्ताव प्रशासन को भेजे। इसके बाद भवन के बारे में विचार किया जा सकता है। पूरी तरह से पुस्तकालय प्रबंधन और विभाग की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने लिए शहर के आसपास जगह देखें।
केंद्रीय पुस्तकालय के सहायक लाइब्रेरियन संदीप कुमार ने कहा कि भवन न होने से यह दिक्कत पेश आ रही है। केंद्र से मिलने वाले बजट को निजी भवन पर खर्च नहीं किया जा सकता। इसके चलते साल भर पैसा पुस्तकालय प्रबंधन के खाते में रहता है। इसके बाद उसे मंत्रालय को वापस भेजना पड़ता है।