एनजीटी ने 16 नंवबर 2017 को योगेंद्र मोहन सेन गुप्ता बनाम भारत सरकार के मामले में विस्तृत फैसला सुनाया था। इस फैसले में कहा गया था कि शिमला और प्लानिंग एरिया के भीतर ढाई मंजिल से ज्यादा ऊंची इमारत नहीं बनाई जा सकती है।
वहीं, पीठ ने उच्च स्तरीय कमेटी गठित कर इसके दो घटक बनाए थे। इसमें एक निगरानी और दूसरी कार्यान्वयन समिति शामिल है। राज्य सरकार ने इस फैसले में समीक्षा की मांग की थी।
राज्य सरकार का कहना था कि एनजीटी के विस्तृत फैसले से कई अड़चनें पैदा हो रही हैं। साथ ही कई जगह ट्रिब्यूनल का आदेश कानून के विरुद्ध भी है।
वन और हरित क्षेत्र व कोर एरिया में 16 नवंबर 2017 के बाद से निर्माण की नई मंजूरी नहीं होगी। इससे पहले तक बन चुके निजी और व्यावसायिक भवन यदि पास किए गए नक्शे और एनओसी के अनुरूप होंगे, तभी मंजूरी होगी।
हालांकि, नक्शे से ज्यादा विस्तार के लिए निजी घर के लिए 5 हजार प्रति वर्ग फीट और व्यावसायिक संरचना के लिए 10 हजार प्रति वर्ग फीट पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति देनी होगी।
ज्यादा जमीन मांगी तो होंगे शिफ्ट
कोर और ग्रीन एरिया में बने व्यावसायिक भवन मालिक अगर अतिरिक्त जमीन की मांग करता है तो उसे शिमला से हटाकर दूसरे जिलों में भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
शिमला प्लानिंग एरिया में ढाई मंजिल से अधिक इमारतों को लेकर दायर की गई पुनर्विचार याचिका को खारिज किए जाने के मामले में प्रदेश सरकार कानूनी सलाह ले रही है।
एनजीटी ने सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान अपने पुराने फैसले को सुरक्षित रखकर सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इस मामले पर उच्चस्तरीय कमेटी के पास जाकर बात करे। अब सरकार वकीलों से सलाह मशवरा करने में जुटी है।
शिमला प्लानिंग एरिया में ढाई से अधिक मंजिलें बनाने पर रोक लगाई है। टीसीपी और नगर निगम शिमला में कोई भी प्लाट मालिक भवन निर्माण को लेकर आवेदन नहीं कर रहे थे।
उम्मीद थी कि सरकार मजबूती से एनजीटी में अपना पक्ष रखकर राहत दिलाएगी, लेकिन अब लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरा है। अतिरिक्त मुख्य सचिव मुख्यमंत्री श्रीकांत बाल्दी ने कहा कि इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है। सरकार इसमें कानूनी सलाह ले रही है। जल्द ही ठोस कदम उठाया जाएगा।