हिमाचल प्रदेश में ठोस कचरा प्रबंधन और सीवरेज की खराब व्यवस्था पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी ने हिमाचल सरकार के मुख्य सचिव को इन दोनों के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रावधान करने के आदेश दिए हैं। ट्रिब्यूनल ने मुख्य सचिव को आदेश दिए कि वह प्रत्येक महीने इन दोनों कार्यों की प्रगति देखें और अपनी अनुपालन रिपोर्ट एनजीटी के समक्ष पेश करें। हिमाचल में सीवरेज और ठोस कचरा प्रबंधन की खराब दुर्दशा पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने संज्ञान लिया है। ट्रिब्यूनल ने मुख्य सचिव को आदेश दिए थे की ठोस कचरा प्रबंधन नियमों का सख्ती से पालन किया जाए। 15 फरवरी 2023 को मुख्य सचिव ने ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी रिपोर्ट पेश की थी। रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल के 54 शहरी निकायों में हर दिन 365 टन कचरा निकलता है। इसमें से 352 टन कचरे को निस्तारण किया जा रहा है। 13 टन कचरा अभी भी हर दिन खुले में ठिकाने लगाया जा रहा है।
इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। इसमें 201 टन गीले कचरे में से आठ टन कचरे का निस्तारण नहीं किया जा रहा है। 146 टन में से पांच टन सूखा कचरा खुले में फेंक दिया जा रहा है। विरासत अपशिष्ट (लीगेसी वेस्ट) को लेकर तो इससे भी बुरा हाल है। हिमाचल के 16 शहरों में इसमें 2,63,641 टन वेस्ट है। अभी तक 83 हजार 28 टन वेस्ट को ठिकाने लगाया जा चुका है। इसी तरह 32 शहरों में अभी भी सीवरेज प्रबंधन की उचित व्यवस्था नहीं है। इन शहरों में 32.15 एमएलडी सीवरेज का गंदा पानी या तो नदी-नालों में पाया जाता है या उन्हें खुले में फेंका जा रहा है। हिमाचल में सीवरेज प्रबंधन प्लांट की व्यवस्था को देखा जाए तो यहां पर हर दिन 163 एमएलडी सीवरेज इक्ट्ठा हो रहे हैं। इसके लिए हिमाचल में 65 सीवरेज प्रबंधन प्लांट की व्यवस्था है। इसमें भी 64 फीसदी सीवरेज का गंदा पानी ट्रीट हो रहा है। ट्रिब्यूनल ने अभी इस मामले का निपटारा नहीं किया है। जबकि मुख्य सचिव से रिपोर्ट तलब की है।
ठोस कचरा प्रबंधन नहीं होने पर हाईकोर्ट ने भी लिया है संज्ञान
हिमाचल प्रदेश में ठोस कचरा प्रबंधन और सीवरेज का प्रावधान नहीं होने पर हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है। प्रदेश भर में कचरे के निस्तारण में विफल रही सरकार से अदालत ने जवाब तलब किया है। सरकार को इस बारे में उचित कदम उठाने के बारे में शपथपत्र के माध्यम से जानकारी तलब की है।