राजधानी शिमला में पीलिया फैलने के लिए जिम्मेदार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मामले में मनी लांड्रिंग की जांच ठप हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय की शिमला इकाई ने फाइल तैयार कर जोनल कार्यालय चंडीगढ़ भेज मामला दर्ज करने के लिए मंजूरी मांगी थी। लेकिन मंजूरी मांगने के दो महीने बाद भी अब तक चंडीगढ़ जोनल आफिस ने मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने के आदेश नहीं दिए हैं।
दरअसल, साल 2016 की शुरुआत में राजधानी शिमला में पीलिया महामारी की तरह फैल गया था। मामले में गठित पुलिस की एसआईटी ने जांच की तो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के संचालन में भारी अनियमितताएं सामने आई थीं। पुलिस पड़ताल के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने प्रारंभिक सबूत मिलने के बाद मामले में मनी लांड्रिंग की जांच खोल दी।
ईडी के शिमला स्थित जोनल कार्यालय ने सिटी पुलिस से पीलिया मामले में दर्ज एफआईआर की प्रति और अन्य रिकॉर्ड मांगे। पड़ताल पूरी होने के बाद शिमला के अधिकारियों ने मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए चंडीगढ़ स्थित जोनल कार्यालय को
फाइल मई में भेज दी। इसमें पीलिया मामले में शिमला पुलिस की एफआईआर को आधार बनाकर मामला दर्ज करने की अनुमति मांगी गई थी। लेकिन दो महीने बाद भी चंडीगढ़ जोनल कार्यालय मामले में एफआईआर कराने के लिए मंजूरी नहीं दे सका है।
जांच में फंस सकते हैं कई आईपीएच अधिकारी
सूत्रों की मानें तो ईडी की जांच में ट्रीटमेंट प्लांट के संचालकों के अलावा आईपीएच विभाग के कई अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है। इसके अलावा ईडी यह भी तलाशने में जुटा है कि इसके पीछे कहीं बड़े नेताओं का हाथ तो नहीं है। बता दें कि शिमला में छह ट्रीटमेंट प्लांट हैं जिनमें से पांच एक ही ठेकेदार के पास हैं।
सिर्फ 35 लाख खर्च करता था ठेकेदार
प्रारंभिक छानबीन से यह बात सामने आई थी कि एक ही ठेकेदार के पास पांच सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं। इनके संचालन के लिए ठेकेदार को आईपीएच विभाग से सालाना 1.35 करोड़ रुपये दिए जाते थे लेकिन ठेकेदार इस राशि में से 35 लाख रुपये ही ट्रीटमेंट प्लांट पर खर्च करता था। हालांकि, इस मामले में ठेकेदार पहले ही मीडिया में सफाई दे चुके हैं कि प्लांट में हर कार्य पारदर्शितापूर्ण रहा है।