अदालत ने टिप्पणी की कि अकसर मामलों के निपटारे में देरी के लिए न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन असल में कई बार पक्षकारों का आचरण ही देरी का मुख्य कारण होता है। निचली अदालत ने 18 नवंबर 2024 को साक्ष्य बंद करने का आदेश दिया था, जबकि इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका एक साल से भी अधिक समय बाद दायर की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सामान्यतया साक्ष्य पेश करने के लिए तीन से अधिक मौके नहीं दिए जाने चाहिए। उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। निचली अदालत में यह मामला वर्ष 2015 से लंबित है।