हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आरक्षण के मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि दूसरे राज्य के लिए प्रवास पर आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता, भले ही विवाह को आधार बनाया गया हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए किसी भी कारण से प्रवासन करना प्रवासी राज्य में एससी, एसटी और ओबीसी के लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता है। किसी विशेष जाति या जनजाति की घोषणा के लिए प्रवासी राज्य में विभिन्न मानदंड हो सकता है।
भले ही एक जाति को प्रवासी राज्य में अनुसूचित जाति, जनजाति या ओबीसी के रूप में अधिसूचित किया गया है, लेकिन किसी भी सूरत में इसका लाभ नहीं मिल सकता है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने प्रवासी प्रियंका की याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया है। याचिकाकर्ता मूल रूप से हरियाणा राज्य के गुज्जर समुदाय से संबंध रखती हैं।
गुज्जर समुदाय को हरियाणा में अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा दिया गया है। याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश के गुज्जर समुदाय में शादी की। हिमाचल में गुज्जर समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में डाला गया है। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित भाषा अध्यापक के पद के लिए आवेदन किया। 10 मार्च 2017 को शिक्षा विभाग ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति से संबंध नहीं रखती हैं।
खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का दर्जा एक राज्य की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। आरक्षण देने का मुख्य मकसद यह है कि वे समान शर्तों पर विकसित वर्ग समुदाय से प्रतिस्पर्धा कर सकें। सामाजिक स्थिति अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकती है। किसी जाति या किसी जनजाति को पूरे देश के लिए अनुसूचित जाति के रूप में सामान्यीकृत करना उचित नहीं है।