हिमाचल प्रदेश के निजी स्कूलों की फीस नियंत्रित करने के लिए सरकार चार वर्ष बाद भी कानून नहीं बना पाई है। कानून बनाने का दावा करने वाली सरकार यह कवायद फाइलों से आगे नहीं बढ़ा पाई है। इस कारण इस वर्ष भी निजी स्कूलों ने पांच से दस फीसदी तक फीस बढ़ा दी है। राज्य निजी शिक्षण संस्थान विनियामक एक्ट 1997 में संशोधन करने की जगह फीस नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने के दावे धरे ही रह गए हैं। अभिभावकों ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से पड़ोसी राज्यों दिल्ली और पंजाब की तर्ज पर निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने की मांग की है।
कोरोना संकट के दौरान वर्ष 2020 में स्कूल बंद होने के बावजूद निजी स्कूलों ने फीस वसूली की प्रक्रिया शुरू की थी। प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस दौरान सरकार ने स्कूल बंद रहने की अवधि की सिर्फ ट्यूशन फीस लेने का फैसला लिया था। इसी वर्ष स्कूल खुलने पर निजी स्कूलों ने बीते महीनों की माफ की गई ट्यूशन फीस भी वसूलनी शुरू कर दी थी। सरकार ने इन स्कूलों पर उस समय कोई कार्रवाई नहीं की।
2021 में सरकार ने फीस नियंत्रण के लिए कानून बनाने की बात कही। कहा गया कि नए कानून के तहत जिला उपायुक्त की अध्यक्षता में बनाई जाने वाली कमेटी में निजी स्कूलों की फीस निर्धारित की जाएगी। कमेटी में निजी स्कूल प्रबंधन के अलावा पीटीए को शामिल किया जाएगा। उच्च शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता वाली कमेटी फीस को मंजूरी देगी। कमेटी में अतिरिक्त निदेशक और प्रारंभिक शिक्षा निदेशक को शामिल किया जाएगा। कमेटी स्कूलों में फीस वसूली की व्यवस्था की मॉनीटरिंग करेंगी।
नए कानून के तहत फीस को तर्कसंगत बनाते हुए वर्दी और किताबें खरीदने को चिह्नित दुकानों की व्यवस्था पर भी रोक लगाने के दावे किए गए। शिक्षा मंत्री से लेकर विभागीय अधिकारियों ने कहा था कि फीस तय करते हुए यह ध्यान रखा जाएगा कि फीस अभिभावकों का शोषण करने वाली न हो, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सरकार की नाकामी से इस वर्ष भी कई निजी स्कूलों ने मनमाफिक तरीके से फीस में बढ़ोतरी कर दी है। अधिकारियों से लेकर शिक्षा मंत्री तक मामले को लेकर कुछ भी कहने से गुरेज कर रहे हैं।