इसके अलावा पूर्व वीरभद्र सरकार की पिछले छह माह के कार्यों की समीक्षा करने, रिटायरियों की नियुक्तियां को निरस्त करने, विचाराधीन तबादलों को जस का तस रोक देने जैसे निर्णय ही हो पाए। दूसरी कैबिनेट भी वीरभद्र सरकार के फैसलों को पलटने पर ही केंद्रित रही।
बीबीएमबी में हिमाचल की बकाया राशि बिजली के रूप में वसूलने की बात जरूर हुई। हालांकि, पंजाब और हरियाणा से ये वसूली करने को अभी सरकार को बहुत बडे़ पापड़ बेलने होंगे। ये सब कैसे होगा, इस पर स्थिति साफ नहीं है।
सचिवालय जाएं तो वहां जिसे भी देखो, वह बुक्के या मिठाइयों के डिब्बे लिया खड़ा नजर आता है। यही हाल दूसरे दफ्तरों में हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय हों या मंत्रियों केे दफ्तर बस जो भी कतारें लगी हैं, वे बधाइयां देने जा रही हैं।
सत्ता में आने से पहले भाजपा ने विजन डॉक्यूूमेंट में व्यय नियंत्रण आयोग स्थापित करने की घोषणा की। डाक्यूमेंट के अनुसार इसे मुख्यमंत्री की देखरेख में शुरू किया जाना है। खर्च कम करने के लिए नई सरकार बातें तो खूब कर रही है, लेकिन फैसलों में ऐसा नहीं दिख रहा।
मंत्रिमंडल की दो बैठकें हो चुकी हैं, मगर इनमें खर्च नियंत्रण पर चर्चा तक नहीं हुई। दूसरी तरफ, भाजपा के नेता बार-बार हिमाचल को कर्ज में डुबोने के पूर्व कांग्रेस सरकार आरोप पर लगाए जा रहे हैं। व्यय नियंत्रण के बजाय सरकार के बधाई उत्सव में सरकार का व्यय बढ़ता ही नजर आ रहा है।
इन दिनोें धर्मशाला में होने जा रहे तेरहवीं विधानसभा के पहले सत्र के आयोजन में भी खर्चा घटने के बजाय बढ़ता ही दिख रहा है। दृष्टिपत्र में मंत्रियों द्वारा लोगों की समस्याओं की सुनवाई के लिए मासिक जनमंच का आयोजन करने की बात है,
मगर इसकी भी कोई तैयारी नहीं दिख रही। खनन माफिया, ड्रग माफिया पर कार्रवाई के अलावा भ्रष्टाचार मुक्त हिमाचल बनाने के वायदे को निभाने के लिए कोई शुरुआती पहल नजर नहीं आ रही है।