शोध आईजीएमसी के फिजोलॉजी विभाग के प्रोफेसर चिकित्सक डॉ. युवराज ने डॉ. मीनू शर्मा, सीनियर रेजिडेंट डॉ. शिवाली व आरकेएमवी कॉलेज के गायन विभाग से डॉ. लक्ष्मी ने किया। शोध आरकेएमवी, संजौली कॉलेज, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और संगीत अकादमियों में हुआ। शोध में खुलासा हुआ है कि शास्त्रीय संगीत थेरेपी की तरह कार्य कर रहा है, क्योंकि जो लोग इससे जुड़े है, उन्हें उच्च रक्तचाप की औरों के मुकाबले कम होता है। यानी उच्च रक्तचाप का लेवल ऐसे लोगों में नॉर्मल है। चिकित्सकों का मानना है कि अगर हाइपरटेंशन से दूर रहना है तो वापस शास्त्रीय संगीत की ओर आना होगा। साथ ही लाइफस्टाइल में भी बदलाव के साथ तनाव मुक्त रहने से उच्च रक्तचाप नहीं होगा।
संगीत सीखतने वाले 18-25 साल के विद्यार्थियों और अन्य में उच्च रक्तचाप का पता लगाया गया। इसमें तीन साल तक संगीत से जुड़े बच्चों और नॉर्मल में हार्ट रेट व रक्तचाप देखा गया। इसमें गायकों में 65 हार्ट रेट रहा और 116/74 रक्तचाप रहा। वहीं, नॉर्मल में 78 हार्ट रेट आया और रक्तचाप 120/79 के आसपास रहा। इससे साफ हुआ कि संगीत सेहत के लिए जरूरी है। वर्तमान में अगर 140/90 रक्तचाप क्रॉस करता है तो वे हाइपरटेंशन श्रेणी में आता है।
आजकल उच्च रक्तचाप की शिकायत न केवल वयस्क और बुजुर्गों में है, बल्कि 15 साल के बच्चे भी इसकी चपेट में है। बच्चों में उच्च रक्तचाप का बड़ा कारण तनाव और प्रेशर है। बच्चे पढ़ाई या अन्य किसी कारण तनाव में आ रहे है और उच्च रक्तचाप से पीड़ित हो रहे हैं।
हम जिस तरह के संगीत सुनते हैं, उसका सीधा असर हमारे हृदय गति, नर्वस सिस्टम और ब्लड प्रेशर पर पड़ता है। शास्त्रीय संगीत धीमा, शांत और मधुर होता है। लय 60 से 80 प्रति मिनट के बीच होती है। साथ ही शरीर का कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर गिरता है और खुशी महसूस कराने वाला हार्मोन बढ़ता है और पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करता है, जिससे ब्लड प्रेशर कम होता है और मांसपेशियों का तनाव दूर होता है।
-शास्त्रीय संगीत सुनकर।
-योग/व्यायाम।
-सुबह/शाम भ्रमण।
-कम सोडियम के आहार।
-जंकफूड और अधिक नमक से परहेज।
-धूम्रपान न करना
भारतीय शास्त्रीय संगीत शरीर में होने वाली खतरनाक बीमारियों का रामबाण है। शोध में पता चला है कि जो लोग शास्त्रीय संगीत शास्त्रीय संगीत से अभी भी जुड़े हैं। उनमें रक्तचाप की शिकायत नॉर्मल लोगों से कम है। इसके अलावा उच्च रक्तचाप से दूर रहने के लिए हमें अपनी लाइफ स्टाइल में भी बदलाव करना होगा। -डॉ. युवराज, प्रोफेसर फिजोलॉजी विभाग व शोधकर्ता आईजीएमसी।