ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य में बागवानों को सेब सीजन के पीक पर होने के बीच ही अचानक सेब तुड़ान रोकना पड़ा है। खुद मुख्यमंत्री जयराम को भी बागवानों से तुड़ान को स्लो डाउन करने की अपील करनी पड़ी है। बागवानों को एक साजिश के तहत फसल के सही दाम नहीं मिल रहे हैं। यह साजिश सेब सीजन की शुरुआत से उस वक्त से ही रची जा रही थी, जब कुछ चुनिंदा बागवानों के सेब की आढ़ती-व्यापारी ऊंची बोलियां लगा रहे थे। ओलावृष्टि से काफी फसल खराब हुई है, ये सही है। लेकिन इनकी आड़ में आढ़तियों, व्यापारियों और कॉरपोरेट घरानों ने गुणवत्तापूर्ण सेब के भी रेट गिरा दिए।
कॉरपोरेट और सरकार की मिलीभगत का नतीजा
सेब के रेट गिरना कारपोरेट कंपनियों और सरकार की मिलीभगत का नतीजा है। इस लूट से किसान-बागवानों को बचाने के लिए ही किसान दिल्ली में आंदोलन पर बैठे हैं। कश्मीर की तर्ज पर एमआईएस के तहत ए, बी और सी ग्रेड की 60, 44 और 24 रुपये के दाम पर सेब खरीद होनी चाहिए।
- संजय चौहान, संयोजक, किसान बागवान संघर्ष समिति
सीए स्टोर खोलने को बागवान संगठनों को मिले अनुदान
अडानी ने सेब के बहुत कम रेट खोले हैं, इससे बागवानों का शोषण होगा। निजी कंपनियों को सीए स्टोर स्थापित करने पर करोड़ों रुपये सब्सिडी दी गई है। सरकार को बागवानों और बागवान संगठनों को छोटे सीए स्टोर खोलने के लिए अनुदान देना चाहिए।
- लोकेंद्र सिंह बिष्ट, अध्यक्ष, प्रोग्रेसिव ग्रोवर्स एसोसिएशन, हिमाचल प्रदेश।
सरकारी तंत्र फेल, बागवान भी जागरूक नहीं
मंडियों में जिस तरह सेब के रेट गिरे हैं, यह पूरी तरह सरकारी तंत्र की विफलता है। बागवान भी जागरूक नहीं है। निजी कंपनियां बागवानों का खून चूस रही हैं। नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बागवानों को निजी कंपनियों का बहिष्कार करना चाहिए।
- डिंपल पांजटा, अध्यक्ष, हिमालयन सोसायटी फॉर हार्टिकल्चर एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट
बागवानों को राहत देने में सरकार पूरी तरह विफल
- संकट के समय में सेब बागवानों को राहत देने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है। मंडियों में रेट गिर रहे हैं लेकिन रिटेल में रेट जस के तस हैं। एपीएमसी को बाहरी राज्यों की एपीएमसी के साथ तालमेल बैठा कर सेब के लिए सही मार्केट उपलब्ध करवानी चाहिए।
- सुरेंद्र सिंह ‘दादा ठाकुर’, अध्यक्ष, यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन
बागवानों से हो रही लूट में सरकार करे हस्तक्षेप
सेब से किसानों-बागवानों पर ऐसी मार पड़ी है कि लोगों ने किसान क्रेडिट कार्ड के पैसे जमा करवाने हैं। बच्चे शहरों में पढ़ रहे हैं। अगर मांग नहीं है तो बोली लगाने के बाद आधे घंटे में इतना सेब क्यों निकल रहा है। सूखा पड़ा था, उसका कुछ नहीं मिल रहा है। किसानों-बागवानों को बीमा लाभ नहीं मिल रहा है। सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। एपीएमसी का कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार को इस मामले में आगे आने चाहिए। आढ़तियों और लदानियों की इसमें मिलीभगत है। सेब की पेटी में 35-35 किलो सेब जा रहा है।
- इंजीनियर रोशन लाल जस्टा, गांव कुंदली, कोटखाई, शिमला।
जन्माष्टमी तक ठीक हो जाएंगे रेट: नरेश ठाकुर
हिमाचल प्रदेश कृषि उत्पाद विपणन बोर्ड के प्रबंध निदेशक नरेश ठाकुर ने कहा है कि अच्छे माल के रेट भी ठीक हैं। जून और जुलाई वाला रेट अभी नहीं हो सकता है। पिछले दाम भी निकाले जाएं तो इस दौरान मांग भी घट जाती है। जन्माष्टमी का पर्व आने वाला है। रेट में उछाल आएगा। आने वाले दिनों में बढ़ेगा। बाढ़, बारिश आदि भी रिटेल प्वाइंट को खुलने नहीं दे रही है। आने वाले समय में दाम अच्छा होगा। नरेश ठाकुर ने कहा कि इस बार ओले बहुत गिरे हैं। उपभोक्ता भी ओले वाले सेब को नहीं खरीद रहे हैं। अदानी के रेट भी कम हैं। वहां इनपुट लागत कम होती है। पैकिंग, ग्रेडिंग, ढुलाई आदि को घटाकर औसत लगाएंगे तो कुल मिलाकर रेट अच्छे ही हैं। बी और सी ग्रेड का सेब बहुत मात्रा में है। आकार, रंग आदि में भी दिक्कत है। इसी से परेशानी हो रही है।
ओलावृष्टि से गिरे सेब के दाम : आढ़ती एसोसिएशन
पराला, ढली और भट्ठाकुफर आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं हरीश फ्रूट एजेंसी (एचएफए) के मालिक हरीश ठाकुर बिट्टू ने कहा कि रेट कम मिलने का मुख्य कारण ओलावृष्टि से फसल का बहुत ज्यादा प्रभावित होना है। खराब सेब आ रहा है। ओलों का दागी जो सेब एचपीएमसी को बोरियों में जाना चाहिए, वह भी पेटियों में जा रहा है। सेब के दाम मांग और आपूर्ति पर निर्भर करते हैं। रेट गिरे हैं, लेकिन अब लोग तुड़ान भी कम कर रहे हैं। लोग आढ़ती पर आरोप लगाते हैं। अडानी की बड़ी बातें हुईं, वह तो बढ़िया माल की पेटी भी 1400 रुपये ले रहे हैं, हम तो अच्छे माल के उससे भी ज्यादा दे रहे हैं। अच्छे माल को दाम मिलेंगे। आढ़ती और लदानी की सांठगांठ के आरोप गलत लगते हैं। पराला और भट्टाकुफर मंडियों की बात करें तो यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। अगर कोई आढ़ती ऐसा करता भी है तो किसान उसके पास नहीं जाएगा।