श्रद्धा एवं भक्ति के आगे पहाड़ जैसी मुश्किलें भी आसान लगती हैं। इस बात को लाहौल में समुद्रतल से 13,124 फीट की ऊंचाई पर स्थित नीलकंठ झील तक पहुंचकर युवा श्रद्धा निशांत ने सच साबित कर दिखाया है। लाहौल के निशांत के साथ तीन अन्य साथी भी थे। इनमें से निशांत ने करीब 15 किमी नंगे पांव सफर किया। अल्यास से झील तक कई जगह एक-से डेढ़ फीट तक बर्फ जमी है। नीलकंठ झील पहुंचकर चार श्रद्धालुओं ने इस पवित्र झील में माइनस तापमान के बीच स्नान भी किया। श्रद्धालुओं के मुताबिक अभी भी नीलकंठ झील बर्फ से ढकी ह। ऐसे में अभी वहां रात्रि ठहराव करना भी सुरक्षित नहीं है। वहीं, मौसम खराब होते ही हिमपात शुरू हो जाता है।
लिहाजा, श्रद्धालु कुछ दिन बाद ही उस ओर तीर्थ यात्रा कर सकेंगे। नीलकंठ झील का दर्शन कर लौटे लाहौल के बिहाड़ी गांव के युवा योगेश, निशांत, अमरजीत और राहुल ने कहा कि नीलकंठ झील की यात्रा अभी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। योगेश ने बताया कि अल्यास से आगे कई हिस्सों में एक से डेढ़ फीट से अधिक बर्फ है। करीब आठ माह बाद इन चार श्रद्धालुओं ने सबसे पहले इस साल नीलकंठ झील के दर्शन किए हैं। इस पवित्र झील के दर्शन का उपयुक्त समय तीन-चार माह से अधिक समय तक नहीं रहता है। अधिकतर समय यह झील बर्फ से ढकी रहती है। पुलिस अधीक्षक मयंक चौधरी ने कहा कि श्रद्धालु मौसम को भांपकर ही नीलकंठ झील का रुख करें।
कैसे पहुंचा जा सकता है नीलकंठ झीलमनाली से 12:30 बजे एचआरटीसी की एक बस केलांग, जाहलमा होते हुए नैनगार गांव तक जाती है। वहां से आगे नीलकंठ झील का सफर तकरीबन 15 किमी है। इस बीच यात्री अल्यास में रात्रि ठहराव के बाद सुबह नीलकंठ झील का दर्शन कर वापस अपने गंतव्य पहुंच सकते हैं। रात्रि ठहराव के लिए श्रद्धालुओं को अपने साथ टेंट और खाद्य सामग्री साथ ले जानी होगी। अल्यास में गद्दी के रहने के अस्थायी डेरे हैं, श्रद्धालु उसमें भी रात गुजार लेते हैंं। सराय आदि की व्यवस्था नहीं है।