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हिमाचल: शिमला शहर में ही की 33 साल नौकरी, अब हाईकोर्ट ने भेजे किन्नौर और लाहौल

Fri, 14 Apr 2023 12:49 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

 न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने एक को लाहौल-स्पीति तो दूसरे को किन्नौर भेजने के आदेश दिए हैं। अदालत ने 1 मई तक अनुपालना रिपोर्ट भी तलब की है।
 
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 बिजली बोर्ड में कार्यरत दो सहायक अभियंताओं (एसडीओ) को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जनजातीय क्षेत्र में स्थानांतरित करने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने एक को लाहौल-स्पीति तो दूसरे को किन्नौर भेजने के आदेश दिए हैं। अदालत ने 1 मई तक अनुपालना रिपोर्ट भी तलब की है। दोनों अधिकारियों के तीन दशक से अधिक समय तक शिमला में ही तैनाती पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

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याचिकाकर्ता राजेश ने महज चार किलोमीटर दूर हुए तबादला आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। आरोप लगाया गया था कि उनका तबादला राजनीतिक सिफारिश पर मल्याणा से खंड नंबर दो कसुम्पटी के लिए किया गया है। आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी देवेंद्र सिंह को समायोजित करने के लिए मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने सिफारिश की है। अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड को तलब किया और पाया कि दोनों ही अधिकारी पिछले 33 साल से राजधानी शिमला में ही तैनात हैं।

बिजली बोर्ड ने जवाब के माध्यम से अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता राजेश ने वर्ष 1990 से 2004 तक खंड नंबर एक में सेवाएं दीं। उसके बाद उनका तबादला खंड नंबर दो के लिए किया गया, जहां उन्होंने वर्ष 2021 तक सेवाएं दीं। उसके बाद खंड नंबर दो के अंतर्गत ही उन्हें मल्याणा स्थानांतरित किया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि 18 मार्च, 2023 को उनका तबादला मल्याणा से खंड नंबर दो कुसुम्पटी के लिए किया गया और प्रतिवादी को उनकी जगह मल्याणा में तैनाती दे दी गई।
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बता दें कि बिजली बोर्ड के खंड नंबर एक और दो कुसुम्पटी में ही स्थित हैं। वहीं, दूसरी ओर प्रतिवादी भी वर्ष 1989 से 2009 तक खंड नंबर एक में सेवाएं देता रहा और वर्ष 2009 से अब तक वह खंड नंबर दो में तैनात रहा। अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि दोनों ही अधिकारियों ने न केवल विभाग के कार्य और नैतिकता के बारे में अनभिज्ञता प्रकट की है, बल्कि उनका आचरण भी कार्यालय के अनुरूप नहीं है। अदालत ने कहा कि दोनों ही अधिकारियों ने उन समानांतर अधिकारियों से अन्याय किया है जो जनजातीय क्षेत्रों में सेवाएं देने के बाद शिमला में अपनी सेवाएं देना चाहते हैं, लेकिन इन प्रभावशाली इंजीनियरों के बनाए गए जाल के कारण अपनी तैनाती पाने में विफल रहे हैं।

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छह माह में भी जवाब दायर न करने पर हाईकोर्ट ने लगाई 20 हजार रुपये की कॉस्ट

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने छह माह में भी जवाब दायर न करने पर 20 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने सचिव गृह और डीजीपी जेल को एक हफ्ते में कॉस्ट जमा करवाने के आदेश दिए हैं। अदालत ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया कि कॉस्ट की राशि जमा करवाने के बाद दोषी अधिकारी से वसूली जाए। याचिकाकर्ता यशपाल सिंह ने अपनी सेवाओं से जुड़े वित्तीय लाभ के लिए याचिका दायर की है। इस याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के बाद अदालत ने 13 दिसंबर 2022 को नोटिस जारी कर जवाबतलब किया था। उसके बाद सात और नौ मार्च को अदालत ने जवाब दायर करने के लिए अतिरिक्त समय दिया था। लेकिन, विभाग ने अभी तक इस मामले में जवाब दायर नहीं किया है।

याचिकाकर्ता के खिलाफ विभाग ने विभागीय कार्रवाई में तीन वर्ष तक वेतन वृद्धि न किए जाने का जुर्माना लगाया था। याचिका में दलील दी गई है कि विभाग ने बिना सोचे-समझे उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की है। याचिका के माध्यम से अदालत को बताया गया है कि विभाग ने उसके खिलाफ आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ता ने चिकित्सा अवकाश के लिए वैध प्रमाण पत्र नहीं दिया है। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार विभाग को वैध प्रमाणपत्र दिया गया है। याचिकाकर्ता के खिलाफ दूसरा आरोप लगाया गया था कि उसने विभाग के आदेशों की अनुपालना नहीं की है। याचिका में दलील दी है कि विभाग ने उसे बिना पदोन्नति के उच्च पद का कार्य सौंप दिया था। जिसके लिए उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं की जा सकती है। हालांकि, अभी विभाग ने अपना जवाब दायर नहीं किया है।

 
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