झालवाड के उस परिवार के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता था कि उनकी 14 साल की बच्ची के साथ रेप हुआ और फिर दरिंदों ने उसका कत्ल कर दिया। जब परिवार को उसके गायब होने का पता चला था तो वो किसी तरह आधी रात के वक्त गाड़ी किराये पर कर पुलिस स्टेशन पहुंचे लेकिन पुलिस ने उनकी रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया था। जानते हैं क्यों? क्योंकि परिवार के लोग लड़की की तस्वीर लेकर नहीं गए थे।
कई बार ऐसा होता है कि जो लोग गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने के लिए थाने पहुंचते हैं उनको इस बेदर्द हकीकत का सामना करना पड़ता है। उधर लड़की के रेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई और इधर परिवारवाले पुलिसिया सिस्टम की भूलभुलैया में ही फंसे रहे।
'पुलिस ने किया अपराध'
पुलिस बेशक एक कांस्टेबल को सस्पेंड करके अपने ऊपर लगे दाग साफ करने की कोशिश करे लेकिन ये समस्या पुलिसिया सिस्टम की जड़ों तक जमी है।
एके जैन एक वकील हैं जिन्होंने गुमशुदगी के मामलो में पुलिस के रुख को लेकर पिछले साल हाईकोर्ट में एक पिटिशन दाखिल की थी। जैन कहते हैं कि झालवाड़ केस आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है।
जैन के मुताबिक,"निर्भया गैंगरेप केस के बाद महिला अपराधों से जुड़े कानूनों में बदलाव किये गए हैं। जो लोकल पुलिस ने किया वो अपराध की श्रेणी में आता है।"
क्या किया कांस्टेबल ने?
पुलिस गाइडलाइन्स के मुताबिक नाबालिग लड़की की गुमशुदगी की घटना सामने आते ही सभी सीनियर पुलिस अधिकारियों और संबंधित एसपी को सूचित करना जरूरी है। बावजूद इसके जिस कांस्टेबल को निलंबित किया गया उसने एसपी तो छोड़िये एसएचओ तक को इंफॉर्म करना ज़रूरी नहीं समझा।
एसपी झालवाड़ राहुल भारत ने बताया कि कांस्टेबल को नियमों के मुताबिक निलंबित कर दिया गया है। लेकिन रामकुमार शर्मा का मानना है कि उन्होंने वही किया जो इस तरह के मामलों में किया जाता है।
क्या कहता है कानून?
शर्मा के मुताबिक,"एसएचओ थाने में नहीं थे। मैंने परिवार से लड़की की फोटो लाने को कहा ताकि उसे बाकी थानों में भी भेजा जा सके। लेकिन वो वापस नहीं आए। मैंने अपनी ड्यूटी की।"
जैन कहते हैं कि इस तरह के मामलों में लड़की की फोटो नहीं चाहिए होती। पुलिस टीम को तुरंत मौके पर पहुंचना चाहिए था और लड़की की खोज शुरू कर देनी चाहिए थी।