राजस्थान में लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी एक बार फिर दो दशक पुरानी स्थिति में नजर आ रही है, जब जाट वोटर पूरी तरह पार्टी से छिटका हुआ था। किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन और अग्निवीर योजना को लेकर जाट पहले ही बीजेपी से नाराज थे। वहीं, मौजूदा कैबिनेट में भी जाटों को बड़ी जगह न मिलना, टारगेट कर तबादले किए जाना और साथ ही राहुल कस्वां का टिकट काटे जाने की घटना ने इस आग में घी का काम कर दिया है।
जाट बनाम राजपूत क्यों बनी लड़ाई
राहुल कस्वां का टिकट क्यों कटा? इसका सीधा जवाब राजेंद्र राठौड़ हैं। इससे चार महीने पहले राजेंद्र राठौड़ को विधानसभा चुनावों में चूरू की तारानगर सीट से कांग्रेस के जाट नेता नरेंद्र बुढ़ानियां के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी थी। राठौड़ की इस हार के लिए राहुल कस्वां की भितरघात को जिम्मेदार बताया गया। यहीं से बदले की शुरुआत हुई और राहुल कस्वां का टिकट कट गया।
वसुंधरा के साथ बीजेपी में आए जाट, फिर छिटके
राजस्थान के चुनावी इतिहास की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पहली बार जाटों को बीजेपी की तरफ खींच कर लाई थीं। इसका असर यह हुआ कि बीजेपी को विधानसभा चुनावों 163 सीटों पर ऐतिहासिक जीत मिली। इससे पहले भैरोसिंह शेखावत के समय बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट चेहरा कभी नहीं रहा। मौजूदा दौर की बात करें तो बीजेपी के मंत्रिमंडल में जाट मंत्री तो हैं, लेकिन इनमें कोई ऐसा बड़ा चेहरा नहीं है जो राजस्थान में जाटों का प्रतिनिधत्व करने का दम रखता हो। बीजेपी ने सतीश पूनिया को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वह भी कामयाब नहीं हो सके।
कांग्रेस नेताओं को शामिल कर डैमेज कंट्रोल कर पाएगी बीजेपी?
2023 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस की ज्योति मिर्धा को पार्टी में शामिल कर उन्हें अपनी पारंपरिक सीट नागौर से चुनाव लड़वाया। लेकिन कांग्रेस के हरेंद्र मिर्धा ने उन्हें हरा दिया। हालांकि अब हरेंद्र मिर्धा और उनके बेटे विजय पाल मिर्धा बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। लेकिन कांग्रेस ने अगर यहां हनुमान बेनीवाल से गठबंधन कर लिया तो बीजेपी के लिए चुनौती बढ़ जाएगी।
पिछली बार साथ रहे हनुमान बेनीवाल भी छिटके
पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी से नागौर सीट पर गठबंधन किया। इसमें हनुमान ने नागौर की सीट तो जीती ही, साथ ही अजमेर, बाड़मेर और राजसमंद सीट पर भी उनके प्रभाव का फायदा बीजेपी को मिला। लेकिन इस बार बेनीवाल भी बीजेपी से छिटक गए। जाट नेताओं के नाम पर अब बीजेपी के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जो हैं वे कांग्रेस से आयातित हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आने वाले जाट नेता अपने साथ इस वर्ग को भी बीजेपी में ला पाएंगे। वहीं, इस सवाल के जवाब में राजनीतक जानकारों का कहना है कि जाटों को खांटी नेता चाहिए और वर्ग की नाराजगी किसी एक नेता के आने-जाने से तय नहीं होती, इसके लिए समग्र परिप्रेक्ष्य (ओवरऑल पर्सपेक्टिव) देखा जाता है।
क्या कांग्रेस इसे भुना पाएगी?
अब एक बड़ा सवाल यह भी है कि जाटों की बीजेपी से नाराजगी का सीधा फायदा किसे होगा। राजस्थान में विकल्प के तौर पर फिलहाल कांग्रेस नजर आ रही है। लेकिन जिस तफ्तार से जाट नेता कांग्रेस को छोड़कर जा रहे हैं, क्या कांग्रेस इस वर्ग को अपने साथ बनाए रख पाएगी?
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बाहरेठ का कहना है कि जाट वोटर काफी समय से बीजेपी से छिटकना शुरू हो चुका था। बीजेपी ने इसकी परवाह नहीं की। अब चुनावों के समय कुछ जाट नेताओं को लाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जाटों की नराजगी के चार बड़े फैक्टर पहले से काम कर रहे थे। इनमें पहला किसान आंदोलन, दूसरा पहलवान आंदोलन, तीसरा अग्नीवीर योजना और चौथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के साथ हुआ सलूक। इसके अलावा सतीश पूनिया की बात करें तो चार साल उन्हें संगठन में काम करवाने के बाद चुनावों से ठीक पहले बदल दिया गया। मौजूदा कैबिनेट में भी जाटों को बड़ी जगह नहीं दी गई। अब इसमें राहुल कस्वां का फैक्टर और जुड़ गया, जिसने नाराजगी बढ़ाने का काम किया है