भीड़भाड़ भरा बस अड्डा, आती-जाती बसों के हॉर्न की तीखी आवाजें, हड़बड़ी मचाते यात्रियों में पहले सवार होने की जल्दी। जयपुर के केंद्रीय बस अड्डे सिन्धी कैंप पर यह दृश्य किसी अन्य आम बस अड्डे जैसा ही है।
बस फर्क है तो यह कि अब राजस्थान रोडवेज की बसों को सीटी बजाकर रवाना करने वाले सिर्फ पुरूष ही नहीं हैं। अब कई महिलाएं भी कंडक्टर बन गई हैं जो राजस्थान राज्य परिवहन पथ निगम की सभी मार्गों पर चलने वाली बसों में अपना काम संभाल रही हैं।
देश के कुछ अन्य राज्य जैसे केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली पहले ही महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की पहल कर चुके हैं। राजस्थान में यह शुरुआत संयोगवश उस समय हुई है जब राजस्थान रोडवेज अपनी स्थापना का पचासवां वर्ष मना रहा है।
राज्य सेवा में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण के तहत महिलाओं को कंडक्टर के पद पर नियुक्ति दी गई है। सफल अभ्यर्थियों में से अधिकतर महिलाएं अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी), अनुसूचित जाति और जनजाति से हैं। सामान्य वर्ग की महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है।
आसान नहीं सफर
कंडक्टर पद के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं ने आवेदन किया और मेरिट में भी बहुत अच्छा स्थान प्राप्त किया।
कंडक्टर की नौकरी पाने के लिए आवश्यक योग्यता अभ्यर्थी का दसवीं पास होना है लेकिन अधिकतर महिलाएं इससे कहीं ज्यादा पढ़ी हुई हैं। कई तो बीएड और एमएड डिग्री प्राप्त भी हैं।
इसी वर्ष फरवरी में नई नियुक्तियों में राजस्थान रोडवेज के सभी आठों क्षेत्रों में महिला कंडक्टरों को नियुक्त किया गया है।
राज्य का सीकर जिला तो इस मामले में अव्वल रहा है जिसमें 130 में से 100 से अधिक पदों पर महिलाएं नियुक्त हुईं। जयपुर, अजमेर और भरतपुर में भी काफी संख्या में महिला कंडक्टरों ने काम संभाला है।
पर क्या यह सफ़र वाकई सुहाना है? बहुत बार बसें यात्रियों से ठसाठस भरी होती हैं और कई मार्गों पर सड़कें उधड़ी हुईं। और उस पर राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में मौसम का मिजाज, जहां लू के गर्म थपेड़े बेहाल कर देते हैं।
मुश्किल सफर
सीकर डिपो में नियुक्त एक महिला कंडक्टर ने बताया, “यह राह बहुत ही मुश्किल है और सफ़र कतई आसान नहीं।”
उनका कहना है कि इस काम में ड्यूटी काफी लंबी है। अभी तो काम नया-नया है पर लम्बे समय में यह निश्चय ही शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला है। और साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारी संभालना भी मुश्किल है।"
नागौर डिपो में काम करने वाली विमला मंडा की कुछ अरसे पहले ही शादी हुई है और उन्हें यही चिंता सता रही है कि आगे जाकर जब परिवार आगे बढेगा तो कैसे काम चलेगा? और मां बनने के पहले नौ महीने रोज़ सफ़र करना कितना मुश्किल होगा और गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी कितना असुरक्षित?
मारवाड़ क्षेत्र के ही डीडवाना डिपो में नियुक्त मंजू प्रजापति का कहना है कि यदि महिलाओं को उनके घर के पास के ही डिपो में नियुक्ति मिले तो राह कुछ आसान हो सकती है।
वैसे उनको अभी तक यात्रियों के व्यवहार को लेकर कोई परेशानी नहीं हुई है। सभी सलीके से पेश आते हैं और अन्य पुरुषकर्मी भी पूरा सहयोग करते हैं।
कस ली है कमर
अधिकतर बस अड्डों पर महिलाओं के लिए अलग से कोई सुविधाएं नहीं होना आम समस्या है। यहां तक कि जयपुर स्थित केंद्रीय बस अड्डे पर भी कंडक्टरों के विश्राम के लिए कोई स्थान नहीं है।
पहले एक विश्राम कक्ष हुआ करता था जहां शौचालय, पंखे, टीवी आदि सभी सुविधाएं थीं पर वह सिन्धी कैंप परिसर में किए जा रहे नवनिर्माण की भेंट चढ़ चुका है।
अब महिलाएं ही नहीं, पुरूष कंडक्टरों को भी सुस्ताने के लिए एक ही स्थान है और वह है बस। ये लोग अपनी-अपनी बसों में ही दोपहर का भोजन करते हैं और थोडा आराम।
हां वॉल्वो और डीलक्स बस की महिला कंडक्टरों का सफ़र थोडा बेहतर है क्योंकि वे बसें अधिकतर वातानुकूलित हैं और उनके ठहराव के स्थान भी कम होते हैं और भीड़ की कोई मारामारी भी नहीं।
बस में पानी की भी व्यवस्था होती है और मिड-वे पर आवश्यक सुविधाएं भी। जयपुर-दिल्ली रूट पर चलने वाली ममता बताती हैं कि डीलक्स रूट पर नियुक्ति मेरिट से होती है।
सीटी बजाने की आदत
पर चाहे सर्दी हो, गर्मी या बरसात उन्हें यात्रियों के टिकट जांचना, बनाना, सवारियों को आवाज़ लगाकर बुलाना और बस रवाना करने और रोकने के लिए सीटी बजाना आदि कार्य तो सभी मार्गों पर करने ही होते हैं।
मंजू गडवाल ने बताया, "आवाज लगाने और सीटी बजाने में पहले काफी झिझक होती थी, अब धीरे-धीरे आदत पड़ रही है।"
उन्हें दो साल का परिवीक्षा काल पूरा करना है और इस दौरान तनख्वाह मिलेगी मात्र 7,900 रुपए।
एक महिला कंडक्टर का कहना है, "हम जानते हैं यह नौकरी महिलाओं के लिए काफी मुश्किल है और बहुत सी महिलाओं के ससुराल वाले भी इसके लिए सहर्ष राजी नहीं हुए। मगर बेरोज़गारी और आर्थिक संकट के चलते 12 घंटे लम्बी यह ड्यूटी निभाने के लिए हमने कमर कस ली है।"