8वीं और 9वीं सदी में सड़क मार्ग की दूरी व दिशा बताने वाली सुनाम में स्थापित कोस मीनार वक्त के थपेड़ों को झेलती हुई मिट्टी में मिलने के कगार पर है। अंतिम सांसें गिन रही इस अनमोल धरोहर की पुरातत्व विभाग भी सुध नहीं ले रहा है हालांकि पश्चिम बंगाल से लेकर पाकिस्तान के बॉर्डर तक कई राज्यों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) देश की इस धरोहर को कारगर तरीके से संरक्षित किए हुए हैं।
कोस मीनार कई जगह से टूट चुकी है। इसका आधार तो क्षतिग्रस्त हो चुका है जबकि ऊपरी हिस्सा भी टूटने लगा है। मीनार धीरे-धीरे दम तोड़ रही है और इसकी प्राचीन छोटी ईंटें उखड़ने लगी हैं।
कोस में प्रत्येक किमी के बाद दूरी बताने के लिए किमी स्टोन स्थापित हैं। अंग्रेजों के शासन में प्रत्येक मील के बाद मील पत्थर लगाए गए थे। इससे पहले आठवीं व नौंवी सदी में सड़क मार्ग की दूरी कोस मीनार दर्शाते थे और एक कोस में पौने चार किमी होते हैं। करीब 12 फुट ऊंची यह कोस मिनार वर्गाकार व प्रतिहार्री इंटों से बनी है और इसमें चूने का प्रयोग किया गया है।
कोस मीनार के यहां होने से प्रमाणित होता है कि प्राचीन समय में मुख्य राष्ट्रीय मार्ग सुनाम से होकर गुजरता था। यह राष्ट्रीय मार्ग सुनाम से हांसी, हिसार होते हुए दिल्ली से आगे जाता था। लेखक फौजा सिंह की पुस्तक सरहिंद थ्रू द एजेज में लिखा है कि तुगलक काल में सरहिंद एक स्टेट थी और राष्ट्रीय मार्ग से देश विदेश में व्यापार इसी मार्ग से होता था।
इतिहासकार एलेग्जेंडर कनिंघम की पुस्तक आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया शिमला 1871 में भी जिक्र है कि सरस्वती नदी बहने तक यह राष्ट्रीय मार्ग कायम था। जब नदी का बहाव शुष्क हुआ तो इस इलाके में रेत के टीले बन गए और आवागमन कठिन हो गया। तब शेरशाह सूरी ने अपने शासन में एक स्थायी राष्ट्रीय मार्ग उत्तर की दिशा में लुधियाना, सरहिंद, अंबाला, दिल्ली बनाया था।
इस एतिहासिक धरोहर की खोज करने वाले यहीं के पुरातत्वविद् रामेश्वर दास जिंदल ने बताया कि उस समय घोड़ों पर सफर होता था। कोस मीनार खास कारण से इतने ऊंचे बनाए जाते थे। रात के समय कोस मीनारों के भीतर लालटेन रखे जाते थे ताकि राहगीर और घुड़सवारों को दूर से मार्ग की दिशा दिखाई दे सके।
पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर नवजोत सिंह रंधावा का कहना है कि विभाग कुछ धरोहरों को चयनित करके उन्हें सरंक्षित कर रहा है। कुछ मिनारें विभाग ने संरक्षित की हैं। इनकी महत्ता को कम करके आंका नहीं जा सकता है। आम नागरिक, निजी समाज सेवी संस्थाओं का नैतिक फर्ज बनता है कि इन धरोहरों को अपने स्तर पर संरक्षित करें।