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कम नहीं हो रहीं सुमेध सैनी की मुश्किलें, अदालत से अग्रिम जमानत याचिका खारिज, लेंगे उच्च न्यायालय की शरण

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मोहाली। पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। शनिवार को जिला अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अब गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें उच्च न्यायालय की शरण लेनी होगी। आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप और भ्रष्टाचार के मामले में विजिलेंस ब्यूरो ने उनकी गिरफ्तारी की दलील अदालत में दी थी। शुक्रवार को विजिलेंस ब्यूरो ने सैनी को गिरफ्तार करने के लिए चंडीगढ़ के सेक्टर-20 स्थित उनकी कोठी पर छापा भी मारा था और कोठी में कई घंटे तक विजिलेंस की टीम रही थी। इस समय सैनी घर पर नहीं थे।
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आय से अधिक संपत्ति रखने और चंडीगढ़ के सेक्टर-20डी स्थित उनकी किराये की कोठी के लिए किराये से अधिक रकम का भुगतान करने के मामले में सुमेध सिंह सैनी की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। मोहाली की अदालत के विशेष न्यायाधीश परमिंदर सिंह ग्रेवाल ने सुमेध सिंह सैनी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। विजिलेंस ब्यूरो ने सैनी पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया है।
इसमें एक्सईएन निम्रतदीप सिंह की मदद लेने का भी आरोप है। विजिलेंस ब्यूरो के अदालत में पेश हुए वकील सरतेज सिंह नरूला ने बताया कि सैनी ने निम्रतदीप के पिता के खाते में करोड़ों रुपये ट्रांसफर किए थे। जहां से पैसा निम्रतदीप के संयुक्त खाते में ट्रांसफर किया गया था, फिर सितंबर 2020 में निम्रतदीप ने सैनी को 75 लाख रुपये वापस कर दिए थे। आरोपियों ने अपने पक्ष में जो दस्तावेज प्रस्तुत किए उनसे भी इस लेनदेन की वास्तविकता साबित नहीं होती। अदालत ने कहा कि यह दस्तावेज बचाव के लिए गढ़े हुए प्रतीत होते हैं।
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विजिलेंस ब्यूरो ने अदालत को बताया कि पूर्व डीजीपी सैनी शुक्रवार से फरार हैं। विजिलेंस टीम ने उन्हें हिरासत में लेने के लिए चंडीगढ़ स्थित उसकी कोठी पर छापा मारा था। 6 सीआरपीएफ और 42 अन्य पुलिस कर्मियों की उनकी जेड प्लस सुरक्षा को भी उनके ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं है। सैनी के वरिष्ठ अधिवक्ता एपीएस देओल ने तर्क दिया है कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध का परिणाम है। सैनी की ओर से दायर की गई अग्रिम जमानत की याचिका को खारिज करते हुए न्यायाधीश ग्रेवाल ने कहा कि विजिलेंस ब्यूरो की ओर से की गई विस्तृत जांच के बाद मामला दर्ज किया गया था, जो दस्तावेजों पर आधारित था।
वहीं, अदालत ने यह भी कहा कि सैनी ने अपनी याचिका में कहा था कि वह निम्रतदीप और उसके पिता को नहीं जानता था और किराए के समझौते और बेचने के समझौते पर हस्ताक्षर करते समय केवल दो मौकों पर उनसे मिला था। लेकिन सैनी के खुद के खातों से पता चलता है कि उन्होंने निम्रतदीप और उनके पिता को किराया इकरारनामा (रेंट डीड) पर हस्ताक्षर करने से बहुत पहले ही 45 लाख रुपये का भुगतान कर दिया था। फिर समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले और उसके बाद भी बिना किसी रसीद के करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया। बाद में 75 लाख रुपये की रसीद से यह भी पता चलता है कि कुछ गड़बड़ है।
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