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कोरोना की मार: स्कूल बस ड्राइवर-कंडक्टर बेरोजगार, बसों की किश्तें चुकाने को बेच रहे घर-प्लॉट

Mon, 05 Jul 2021 12:07 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली

सार

कोरोना काल में बच्चे स्कूल नहीं जा रहे। हालांकि उनकी पढ़ाई तो ऑनलाइन चल रही है, प्रबंधकों को फीसें आ रही हैं, लेकिन स्कूल बस ऑपरेटर के लिए यह समय काफी संकट भरा है। डेढ़ साल से खड़ी बसें कंडम हो रही हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
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विस्तार
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कोरोना महामारी ने स्कूल बस कारोबार से जुड़े लोगों को गहरे जख्म दिए हैं। हालत यह हो गई है कि बसें चलाने वाले ड्राइवर कंडक्टर बेरोजगार हो गए हैं, जबकि ऑपरेटर बसों की किश्तें चुकाने के लिए घर या प्रॉपर्टी बेचने को मजबूर हैं। इसी तनाव में अब तक छह ट्रांसपोर्टर अपनी जान दे चुके हैं। मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 
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ट्राइसिटी में पांच हजार से अधिक प्राइवेट स्कूल बसें चलती हैं। इनसे 10 से 12 हजार लोगों को सीधे तो लगभग तीन हजार को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता था। अब यह बसें खड़ी हैं। ऑपरेटर बसों की किश्तें व टैक्स भरने के कारण परेशान हैं। सबसे ज्यादा परेशानी बैंकों से हो रही है। बैंक वाले बसें जब्त करने से बाज नहीं आ रहे हैं। 


तनाव में डूबे बस ऑपरेटर दे रहे हैं जान
मैं पच्चीस साल से स्कूल बस आपरेटर के रूप में काम कर रहा हूं। मेरी खुद की 18 बसें चलती हैं। लेकिन पिछले साल मार्च से ये बेकार खड़ी हैं। कोविड ने बहुत नुकसान किया है। यहां तक कि बसों की किश्तें, इंश्योरेंस, टैक्स व अन्य खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। छह ऑपरेटर तो अपनी जान दे चुके हैं। वे इस हालात का सामना नहीं कर पाए। - संदीप सिंह मान, सेक्रेटरी, मोहाली स्कूल  बस वेलफेयर एसोसिएशन
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न सरकार से राहत न बैंक वाले सुन रहे दलीलें
कोविड काल स्कूल बस कारोबार से जुड़े लोगों के लिए मुश्किल भरा रहा है। हमारे कई ड्राइवर कंडक्टर बेरोजगार हो गए। बसों की किश्तें निकालने के लिए पैसे नहीं हैं। बस ऑपरेटर संकट में हैं। सरकार से कोई राहत नहीं मिल रही है। बैंक वाले हमारी मजबूरी समझते नहीं हैं। उन्हें कहा कि जब स्कूल खुलेंगे तो भुगतान कर देंगे, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं। - जसविंदर सिंह, सेक्रेटरी, मोहाली स्कूल बस वेलफेयर एसोसिएशन

हमारे लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई 

डेढ़ साल में बस ऑपरेटर पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। गाड़ियां न चलने से टायर और बैटरियां खत्म हो गई हैं। जबकि बस ऑपरेटरों को रोड टैक्स, इंश्यारेंस व गाड़ियों की किश्तें भरने में दिक्कत आ रही है। पंद्रह हजार से अधिक ड्राइवर, कंडक्टर, मैकेनिक बेरोजगार हो गए। इधर, डीजल तीस से पैंतीस पैसे रोजाना बढ़ रहा है। ऐसे में स्कूल खुलने पर स्कूल बसों का किराया भी बढ़ेगा। यह बात भी स्कूल बस ऑपरेटरों के लिए मुसीबत बनेगी। हमारे लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है। - हरभजन सिंह राठौर, प्रधान, मोहाली स्कूल बस वेलफेयर एसोसिएशन

बस ऑपरेटरों की मदद करे स्कूल प्रबंधन 
स्कूल तो ऑनलाइन चल रहे हैं, प्रबंधकों को फीसें आ रही हैं, लेकिन स्कूल बस ऑपरेटर के लिए यह समय काफी संकट भरा है। उनकी तरफ से स्कूलों को पत्र लिख गया था कि मुश्किल समय में उनकी आर्थिक मदद की जाए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। अब स्कूल खुलेंगे तो बसों को चलाने के लिए खर्च होगा। बस ऑपरेटर के पास पैसे ही नहीं हैं। वह पंजाब सरकार से मांग कर रहे हैं कि चंडीगढ़ प्रशासन की तर्ज पर उन्हें राहत दी जाए। - मनजीत सिंह सैनी, प्रधान, चंडीगढ़ स्कूल बस ऑपरेटर वेलफेयर एसोसिएशन ट्राइसिटी
 

बसें बिक गईं, रेहड़ी लगाकर सब्जी बेची

मेरी अपनी तीन स्कूल बसें थीं, लेकिन कोरोना काल में तीनों बिक गईं। इस समय घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई लिखाई की चिंता सता रही है। दो बेटियां हैं। वह हायर स्टडी कर रही हैं। आने वाले समय में उनकी शादी भी करनी है। समझ नहीं आ रहा है कि आखिर क्या करूंगा। इस काल में मैंने सब्जी तक बेची। हालात यह है कि ड्राइवर की नौकरी तक नहीं मिल रही है। - राम सिंह, सेक्रेटरी, मोहाली स्कूल बस वेलफेयर एसोसिएशन 

अन्य उद्योगों की तरह दी जाए रहात
स्कूल बस ऑपरेटर मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। वह हर स्तर पर आवाज उठा रहे हैं। सरकार के मंत्रियों से मुलाकात कर रहे हैं। उन्हें अपनी परेशानियों से अवगत करा रहे हैं। बसों के टायर, बैटरियों से लेकर अन्य चीजों को नुकसान पहुंचा है। वह सरकार से अपील कर रहे हैं कि जैसे अन्य उद्योगों को राहत दी गई, उन्हें भी दी जाए। - गुरजीत सिंह सिद्धू, स्कूल बस ऑपरेटर

बस ऑपरेटरों को दी जाए राहत
स्कूल बस ऑपरेटरों को कोविड काल में काफी नुकसान हुआ है। खड़ी बसें जंग खा रही हैं। टायर और पेंट तक खराब हो गए हैं। बसों को दोबारा रोड पर लाने के लिए लाखों खर्च करने पड़ेंगे। समझ नहीं आ रहा है कि पैसा कहां से आएगा। इसके अलावा बैंक वाले ऑपरेटरों को किश्तों के लिए परेशान कर रहे हैं। टैक्स में अभी तक राहत नहीं दी गई है। - हरदेव सिंह, प्रधान, पंचकूला स्कूल बस वेलफेयर एसोसिएशन
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भावी पीढ़ी को शिक्षित करने वालों के सामने गुजर-बसर करने का संकट

कोरोना संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन का खामियाजा प्रतिदिन कमाने-खाने वाले से लेकर आम आदमी तक सभी को भुगतना पड़ रहा है। निजी स्कूलों के शिक्षक भी इन्हीं में से एक हैं। निजी स्कूलों ने अपने खर्च में कटौती की, जिसका खामियाजा वेतन में कटौती और बेरोजगारी के रूप में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है।

शहर के एक नामी स्कूल में शिक्षिका स्वर्णजीत कौर बताती हैं कि उनके पति का स्वरोजगार है। कोरोना काल में पति का काम लगभग ठप है। उन्हें खुद को पिछले 6 माह से वेतन नहीं मिला। पिछले साल कोरोना लॉकडाउन के चलते पहले ही स्कूल प्रबंधन ने वेतन आधा कर दिया था। अब पिछले छह माह से वेतन मिला ही नहीं। इस कारण घर खर्च चलाना तक मुश्किल हो गया है। जो कुछ जमापूंजी थी, वह अब तक के लॉकडाउन में खर्च हो गई। किराए के मकान में रह रहे हैं, इस कारण ज्यादा परेशानी है। उन्हें घर भी चलाना है और मकान का किराया भी देना है। उन्होंने ऑनलाइन ट्यूशन को आमदनी का विकल्प बनाया। लेकिन, इससे इतनी आमदनी नहीं हो रही कि घर का खर्च चलाया जा सके।

स्कूल ने पहले आधी सैलरी दी, बाद में नौकरी से निकाला
ज्योति बाला लालड़ू के एक निजी स्कूल में बतौर शिक्षिका पढ़ाती थीं। मार्च 2020 में कोरोना ने दस्तक दी। उस महीने पूरा वेतन मिला। अप्रैल के बाद प्रबंधन ने आधा वेतन देना शुरू कर दिया। प्रबंधन की बहुत मिन्नतें कीं। अक्तूबर में यह कहकर नौकरी से निकाल दिया कि वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। ज्योति ने बताया कि पूरा काम करवाने के बावजूद सैलरी नहीं दी जाती थी। इससे घर का पूरा बजट बिगड़ गया। पति का वेतन कम है, उसी से जैसे तैसे गुजारा कर रहे हैं। एक छोटी मोटी नौकरी पकड़ी है, जिससे कुछ दिक्कत कम हुई है।

स्कूल बंद होने से प्रिंटिंग का काम भी बंद, नहीं आ रहे छपाई के ऑर्डर
स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों का शेड्यूल, डायरी, कैलेंडर, फीस बुक, प्रश्न पत्र आदि स्टेशनरी हमारे पास छपने के लिए आती थी। कोरोना से पहले काम अच्छा चल रहा था। दुकानों की बिल बुक, स्टेशनरी, शादियां और अन्य समारोह आदि न होने से छपाई का काम बंद पड़ा है। कुछ तो डिजिटलाइजेशन की मार पड़ी, रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। बहुत बुरे हालात में जी रहे हैं। प्रिंटिंग के काम में इस्तेमाल होने वाले कागजों की कीमत काफी बढ़ गई है। - सुमित शर्मा, प्रिंटिंग का काम करने वाले
 
 
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