रूस-यूक्रेन की जंग में अपनों को निकालने की वाहवाही लूटने में जुटी सरकार और दूतावास ने जो किया वो मदद नहीं है बल्कि हमें मरने के लिए वहां छोड़ दिया था। मंगलवार सुबह 4 बजे दिल्ली पहुंचे जालंधर के जतिन सहगल जब परिवार से मिले तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। परिजनों से मिल नम आंखों से उन्होंने अपनी दास्तां बयां की तो वह भी भावुक हो उठे। जतिन सहगल से सरकार के प्रयासों व घर वापसी से जुड़े सवाल-जबाव हुए तो उनकी आंखों में सरकार के प्रति रोष दिखा।
दिल्ली पहुंची सेना अधिकारी के बेटी स्नेहा गुप्ता ने कहा कि दूतावास के लोगों ने यहां तक कह दिया था कि हम नहीं कर रहे हैं यूक्रेन छोड़ो आपकी मर्जी है। कुछ भी घट सकता था जब हमें निकालने के बजाय दूतावास के अधिकारी ऐसा बोल रहे थे तो हम सभी डर गए थे कि अब कैसे निकल पाएंगे।
जंग के ये 13 दिन, खारकीव के बंकरों में गुजरे वो 7 दिन जो माइनस 5 डिग्री में एक वक्त का खाना खाकर गुजारने पड़े, कभी नहीं भूलेंगे। धमाकों ने सोने नहीं दिया, बंकर हो या यूक्रेन का अंतिम सफर बनी 48 घंटे के लिए बस... वो काली रातें जाग कर काटनी पड़ी। हमारी बस को रास्ते में किसी ने रोका तो नहीं लेकिन धमाकों से रास्ते जरूर बदलने पड़े। 16 घंटे फ्लाइट से सफर कर जब घर पहुंचा तो सुकून जरूर मिला, लेकिन चैन की नींद नहीं सो पा रहे, अब भी वो दिल दहला देने वाले मंजर आंखों में घूमते हैं। एक समय लग रहा था कि हम सब घर पहुंचेंगे या नहीं लेकिन परिस्थितियों से जूझते हुए एक-दूसरे का साहस बने और अभिभावकों की प्रार्थनाओं के फल से हम घर पहुंचे हैं। ट्रेन में न चढ़ने देने का वो वाकया छोड़ दें तो हमारी यूक्रेन फौज ने पूरी सहायता की।