लेखक राकेश कुमार ने बताया कि पांच जून 1940 को अदालत ने शहीद ऊधम सिंह को फांसी की सजा सुनाई थी। उसके बाद जज ने ऊधम सिंह से पूछा कि कुछ कहना चाहते हो, तब ऊधम सिंह ने अपने हाथ से लिखे आठ पेज से बोलना शुरू किया। 25 मिनट बोलने के बाद वे आगे नहीं बोल सके, क्योंकि ब्रिटिश पुलिस उन्हें अदालत से बाहर ले गई। इसलिए ऊधम सिंह ने गुस्से में आकर उक्त दस्तावेज फाड़कर अदालत में फेंक दिए थे, जिन्हें अंग्रेजों ने उठाकर जोड़कर रिकॉर्ड में रख लिया था।
इन बातों को पढ़ने में मिली सफलता
1. शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पे पिटने वालों का यही निशान होगा।
2. वतन रहे शाद कौम हो आबाद, हमारा क्या है रहे रहे ना रहे।
3. मार के भजाओ इन्हां फरंगियां पैन ढूंढे वैन, मैमां होन रंडियां।
4. ना धन की हो परवाह मुझे ना आग में बदन यदि है, बाद कोई तो फकत यादे वतन।
5. दिल फिदा करते हैं जान फिदा करते हैं, खुश रहे अहले वतन हम तो सफर करते हैं।
जो कुज पास हो वह माता के नजर करते हैं।
6. मुबारक हो वो जो कौमी काम करते हो बस, उस नूं अपना फर्ज मुनसबी समझो हो कौम की खिदमद।
7. चमन जो कौम का सूखा पड़ा है, एक मुद्दत से उसे मैं खून से सींच कर गुलशन बना दूंगा।
8. फूल खिलते ही पाया के सैय्याद आया, दिल के अरमान कहे खाक निकले बुलबुल।
9. नौजवानों मौका है उठो खुल खलो मादर वतन पे जो आए मुसीबतें शौक से झेलो, देश के सदके को जवानी देलो फिर मिलेगी माता की दुआएं ले लो।
10. किस काम की वो नदी जिसमें न हो रवानी, अगर जोश ही ना हो किस काम की वो जवानी।