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Kargil Vijay Diwas: चाचा लांसनायक हरीश शर्मा के बलिदान के बाद अब भतीजा सेना में भर्ती हो कर रहा देश सेवा

Thu, 25 Jul 2024 09:39 PM IST
अंकेश ठाकुर संवाद न्यूज एजेंसी, पठानकोट (पंजाब)

सार

26 जुलाई, ये वह दिन है जो हर भारतीय को गौरवान्वित करता है। 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इसी दिन ही कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को हराकर भारतीय सेना ने जीत का परचम लहराया था। हमें अपने सेना व सैनिकों पर गर्व है। 
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कारगिल के बलिदानी। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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कारगिल युद्ध के 25 वर्ष पूरे होने पर देश उस युद्ध में बलिदान होने वाले रणबांकुरों के शौर्य को याद कर रहा है। वहीं, उस जंग में अपने जिगर के टुकड़े कुर्बान करने वाले उन बलिदानी सैनिकों के परिजन जिन्होंने उस युद्ध के 25 वर्षों बाद भी अपने वीर पुत्रों के बलिदान की गरिमा को धूमिल नहीं होने दिया। उस युद्ध की विभीषिका का दंश झेल रहे उनके परिजनों के घाव आज भी हरे हैं।

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पठानकोट के सीमावर्ती गांव झरौली से ऐसा ही एक बलिदानी परिवार है जिसने अपना सपूत कारगिल युद्ध में कुर्बान कर बलिदानी परिवार कहलाने का गौरव प्राप्त किया। हम जिक्र कर रहे हैं उस युद्ध में कुर्बान होने वाले सेना की 13 जैक राइफल्स यूनिट के लांसनायक हरीश पाल शर्मा की मां राजदुलारी का जिनकी आंखें कारगिल युद्ध को स्मरण करते हुए बरबस ही छलक उठती हैं। 

बेशक सरकार 25 वर्ष पूर्व हुए कारगिल युद्ध की जीत का जश्न सिल्वर जुबली के तौर पर मना रही है मगर इस जश्न के पीछे एक घना अंधेरा है, जिसमें सिसकियां हैं, उन परिवारों की जिन्होंने उस युद्ध में अपने लाल कुर्बान किए हैं। 
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कारगिल के बलिदानी लांसनायक हरीश पाल शर्मा की माता राज दुलारी व भाई सतीश शर्मा ने अपना दर्द बयान करते हुए बताया कि कारगिल युद्ध छिड़ने पर 15 जून 1999 को अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतेह करते हुए हरीश पाल शर्मा ने पाक सेना को धूल चटाते हुए अपना बलिदान दिया था उसके देश पर कुर्बान होने के बाद बेशक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन उनके बलिदान पर हमें आज भी गर्व है। 

बलिदानी लांसनायक हरीश पाल शर्मा की माता ने नम आंखों से बताया उनका पौत्र व हरीश पाल का भतीजा अखिल शर्मा ने अपने चाचा के बलिदान से प्रेरित हो उनकी शूरवीरता की कहानियां सुनते हुए सेना में भर्ती होने का फैसला लिया तथा जहां भी भर्ती होती वह उसमें भाग लेने के लिए वहां पहुंच जाता जिसमें वह कई बार असफल भी रहा मगर उसने हिम्मत नहीं हारी आखिर 2019 को वह सेना की आरटी रेजीमेंट में भर्ती हो गया। उसका एक ही सपना है कि वह भी देश लिए कुछ ऐसा करे कि हर देशवासी उनके चाचा की तरह उस पर भी गर्व करे।

बेटे की शहादत के 25 वर्षों बाद भी सरकारें कर रही अनदेखा
बलिदानी की मां राज दुलारी ने कहा बेटे की शहादत के 25 वर्षों के दौरान किसी भी सरकार व प्रशासन ने उनके परिवार को पूछा तक नहीं। सिर्फ शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्य खासकर परिषद के महासचिव कुंवर रविंद्र विक्की हमेशा उनका सहारा बन हर सुख-दुख में परिवार से खड़े रहते हैं तथा कई बार उन्होंने उनके परिवार को सेना से आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाई है तथा हमारे मनोबल को उन्होंने कभी टूटने नहीं दिया।

शहीद के बलिदान से प्रेरित हो 8 युवा सेना में हुए भर्ती 
बलिदानी के परिवार को ढांढस बंधाने पहुंचे शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर सिंह विक्की ने कहा कि लांसनायक हरीश पाल शर्मा के बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रज्जवलित देशभक्ति की लौ को क्षेत्रवासियों ने कभी मध्यम नहीं होने दिया उनके शौर्य व बलिदान से प्रेरणा लेकर इस गांव के आठ युवा आज भी भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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स्कूल का नाम रखा गया बलिदानी के नाम पर
कुंवर विक्की ने बताया कि बलिदानी हरीश पाल के अंतिम संस्कार पर राजनेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों ने बलिदानी की याद में गांव में एक यादगारी गेट, लाइब्रेरी, स्टेडियम व स्कूल का नाम बलिदानी के नाम पर रखने की घोषणा की थी, गांव के प्रवेश द्वार पर सरकार ने एक गेट तो बनवाया मगर कुछ समय बाद ही उसकी टाइलें उखड़ गईं लेकिन तीन साल पहले पिछली सरकार में विधायक रहे जोगिंदर पाल ने अपने खर्चे पर गेट का जीर्णोद्वार करवाते हुए उस पर बलिदानी की प्रतिमा भी लगवाई वहीं परिषद के प्रयासों से कुछ महीने पहले गांव के सरकारी स्कूल का नाम बलिदानी के नाम पर रखा गया। मगर अफसोस लांसनायक हरीश पाल शर्मा के बलिदान के 25 वर्षों बाद भी गांव में उनकी याद में न तो लाइब्रेरी बनी और न ही स्टेडियम का निर्माण हुआ जो कि कारगिल योद्धा के बलिदान का अपमान है।
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