महादेव के सिर पर अकबरी पगड़ी, तन पर खादी का कुर्ता और धोती और केसरिया बनारसी जरीदार साड़ी में सजीं गौरा। खप्पर की कालिमा सजाए मनोहारी रूप में बाबा और दुल्हन बनी गौरा को विदा करते काशीवासियों का हर-हर महादेव का जयघोष की गूंज। डमरुओं की ध्वनि, शंख की नाद और हवा में उड़ता रंग-बिरंगा गुलाल। जिधर देखिए बस लाल ही लाल गुलाल। रंगभरी एकादशी पर रजत पालकी में सवार बाबा विश्वनाथ जब गौरा को लेकर चले तो काशी की गलियों में भी आस्था की हिलोरें धूम मचाती रहीं।