काशी की अड़भंगी होली का रंग देश भर में अनूठा है। बाबा विश्वनाथ जहां अपने भक्तों के संग रंगों से होली खेलते हैं तो अपने गणों के साथ चिता-भस्म से। इसी तरह काशी की होलिकाओं का भी अपना अलग ही अंदाज है। गंगा घाट से लेकर वरुणा पार तक काशी ने अपनी प्राचीनता को संजो कर रखा है।
विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी में होलिकाओं का स्वरूप भी उतना ही प्राचीन है। हर मोहल्ले, चौराहे और गलियों में होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। काशी में कई होलिकाएं ऐसी भी हैं जो कई सदियों से जलती आ रही हैं। शीतलाघाट की होलिका जहां गंगा से भी प्राचीन मानी जाती है वहीं कचौड़ी गली की होलिका 14वीं शताब्दी से जलती आ रही है। आगे की स्लाइड्स में जानते हैं इनके बारे में...
विज्ञापन
कचौड़ी गली में रखी गई थी पहली प्रह्लाद की प्रतिमा
2 of 8
गोबर के उपले से तैयार भोजूबीर की होलिका में भक्त प्रह्लाद को होलिका के गोद में बैठी मूर्ति लगाई गई है।
- फोटो : अमर उजाला।
कचौड़ी गली के नुक्कड़ पर जलने वाली होलिका का इतिहास 14वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपने दादा-परदादा और पुरनियों से इस होलिका के बारे में सुना था। काशी में यहीं से होलिका में प्रह्लाद की पहली प्रतिमा रखने की शुरुआत हुई थी। यहां घर-घर से लकड़ियों व कंडे का अंशदान होलिका में प्रदान किया जाता है।
विज्ञापन
शीतलाघाट पर जलती है पहली होलिका
3 of 8
शीतलाघाट की होलिका का रुद्र सरोवर के दौर से जलाने की परंपरा चली आ रही है। केंद्रीय देव दीपावली समिति के अध्यक्ष वागीश शास्त्री ने बताया कि शीतला घाट पर जलाई जाने वाली होलिका का इतिहास काशी में सबसे अधिक प्राचीन है। अपने बुजुर्गाें से सुनते रहे हैं कि कई पीढ़ियों से यहां पर होलिका दहन किया जा रहा है। मान्यताओं की बात करें तो होलिका दहन तब से हो रहा है जब से काशी में गंगा की जगह रुद्र सरोवर हुआ करता था।
अनोखी है होली और होलिका दहन
4 of 8
शहर में सजाई गई होलिका
चिता भस्म की अनोखी होली के लिए मशहूर मणिकर्णिका घाट की होलिका दहन का इतिहास भी सदियों पुराना है। बाबा मशाननाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि जब से काशी में चिताएं जल रही हैं तब से यहां पर होलिका का दहन भी होता आ रहा है। होलिका दहन के अलावा होली का स्वरूप भी यहां पर अनोखा है।
विज्ञापन
तिजहरिया से निकलता था जुलूस
5 of 8
असि की होलिका दहन का स्वरूप भी सबसे अनूठा है। यहां पर रंगों की पुड़िया व मिठाइयां होलिका दहन पर बांटी जाती थी। अस्सी निवासी आरके पाठक ने बताया कि अस्सी पर जगन्नाथ मंदिर के नजदीक जलने वाली होलिका का इतिहास भी सदियों से जुड़ा है।
बुजुर्ग बताते थे कि होलिका की तिजहरिया से ही नगाड़ों का जुलूस चंदा मांगने निकल जाता था। होलिका दहन के पश्चात पूरे मोहल्ले के बच्चों को मिठाइयां, रंगों की पुड़िया बांटने की रस्म निभाई जाती थी। हालांकि अब यह परंपरा बस नाममात्र की ही बची है।
विज्ञापन
पेशवाओं से पहले की है भदैनी की होलिका
6 of 8
सुरक्षा का जायजा लेते पुलिस अधिकारी
भदैनी की होलिका में दही, रंग हांडी फोड़ने का आकर्षण हर किसी को अपनी तरफ खींचता है। भदैनी निवासी प्रताप बहादुर सिंह ने बताया कि यहां की होलिका का इतिहास तो काशी में पेशवाओं के आने से पहले का है। उसके पहले से ही यहां पर होलिका दहन की परंपरा आज तक चली आ रही है। पेशवाकाल में इसकी रौनक तो बस देखते ही बनती थी। बीते कुछ सालों से यहां पर दही की हांडी फोड़ने की परंपरा युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।
विज्ञापन
काशी विश्वनाथ दरबार में भी होलिका की प्राचीन परंपरा
7 of 8
होलिका।
श्री काशी विश्वनाथ दरबार में भी होलिका दहन की प्राचीन परंपरा अनवरत जारी है। काशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ के मंदिर के प्रथम द्वार ढुंढिराज गणेश की होलिका की अग्नि में अन्न के अंशदान की परंपरा है। ढुंढिराज के सामने जलाई जाने वाली होलिका भी सदियों पुरानी है। यहां लकड़ी व कंडे के साथ नवान्न के अंशदान की भी पुरानी रस्म रही है।
महाश्मशान और हरिश्चंद्र घाट पर शवयात्रा व शवदाह की बची वस्तुओं से होलिका बनाई गई। दशाश्वमेध घाट और मानसरोवर घाट पर उपले की, गाय घाट पर सूखे पेड़ों की तो जैन घाट पर छतरी वाली होलिका जलेगी। वहीं अर्दली बाजार और चेतगंज में होलिका के साथ कोरोना का भी दहन किया जाएगा।