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मेरठ: मशहूर थी तीन दोस्तों की तिकड़ी, मेजर मयंक की शहादत पर भावुक हुए दोनों जिगरी यार   

Mon, 13 Sep 2021 05:42 PM IST
Dimple Sirohi आशुतोष भारद्वाज, अमर उजाला, मेरठ
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई - फोटो : अमर उजाला
शोपियां में शहीद हुए मेजर मयंक विश्नोई की शहादत पर हर आंख नम है। रविवार शाम को शहीद का गमगीन माहौल में पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। वहीं सोमवार को भी शहीद के आवास पर परिवार को सांत्वना देने आने वालों का तांता लगा रहा। मेजर मयंक की शहादत पर उनके दोस्तों को गर्व तो है लेकिन दोस्त को खोने के गम ने उन्हें भी तोड़कर रख दिया है।

मेजर मयंक के मेरठ निवासी दोस्त दिशांत उनके घर पहुंचे तो दूसरे दोस्त ने फोन पर परिजनों से बात की। दोनों दोस्त एक दूसरे से फोन पर बात कर मेजय मयंक की बातें करते रहे। दरअसल इन तीनों की दोस्तों की तिकड़ी कंकरखेड़ा क्षेत्र में मशहूर थी। लेकिन इस दोस्ती को न जाने किसकी नजर लग गई। दोनों दोस्तों को शायद ही इस बात का अंदाजा हो कि उनका जिगरी यार इतनी जल्दी उनका साथ छोड़ जाएगा। मेजर मयंक का एक दोस्त एयरफोर्स में तो दूसरा बैंक में कार्यरत है। तीनों दोस्तों की जोड़ी पूरे क्षेत्र में मशहूर थी। मार्शल पिच और डिफेंस में हुए कई क्रिकेट टूर्नामेंट में तीनों ने जीत दिलाई। तीनों दोस्तों में पढ़ाई और स्पोर्ट्स में मेजर मयंक सबसे अच्छे थे।
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई - फोटो : अमर उजाला
मेजर मयंक ने 12 वीं तक की शिक्षा केवी पंजाब लाइंस से प्राप्त की। स्कूल में उनका सिर्फ एक मित्र नंगलाताशी निवासी अमन रहा। अमन आजकल एयरफोर्स में टेक्निकल विभाग में कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त एक और मित्र दिशांत शर्मा रहा, जो शिवलोकपुरी में मयंक के पड़ोस में रहता है। दिशांत ने कृष्णा पब्लिक स्कूल से 12 वीं कक्षा उत्तीर्ण की और आजकल पीएनबी में कार्यरत हैं। 
 
 
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई - फोटो : अमर उजाला
तीनों मित्र गोविंदपुरी में चीनू भाई के यहां गणित का ट्यूशन पढ़ने साथ जाते थे। दिशांत ने बताया कि दसवीं और बारहवीं कक्षा में मयंक ने 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए। पूरे मोहल्ले के बच्चों को मयंक का ही उदाहरण दिया जाता था।

देश सेवा का था अटूट जज्बा 
सेना में बॉर्डर पर तैनात रहने के लिए कुछ अनिवार्य नियम होते हैं। हिल एरिया में कार्य करने के लिए समय सीमा निर्धारित होती है। दिशांत ने बताया कि मेजर मयंक बॉर्डर की ही पोस्टिंग मांगते थे। डेढ़ वर्ष बॉर्डर पर रहने के बाद उच्च अधिकारियों ने उनसे कहा था कि छह माह का हिल एरिया में आपका समय शेष है। यह समय बाद में पूरा कर लेना, लेकिन मयंक ने कहा कि वह बॉर्डर पर ही रहना चाहते हैं। अति आवश्यक परिस्थितियों में ही मयंक छुट्टी लिया करते थे।

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शहीद मेजर मयंक विश्नोई - फोटो : अमर उजाला
साइकिल से जाते थे कोचिंग
एनडीए का एग्जाम पास करने के लिए मयंक ने डिफेंस कॉलोनी गंगानगर में कर्नल देवगन से ट्रेनिंग ली। दिशांत ने बताया कि वह साइकिल से ही कोचिंग जाते थे।
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई - फोटो : अमर उजाला
पांचवें प्रयास में हुआ एनडीए में सेलेक्शन
मयंक एनडीए की परीक्षा तो पास कर लेते थे, लेकिन इंटरव्यू में रह जाते थे। मित्र दिशांत ने बताया कि पांचवें प्रयास में मयंक को सफलता प्राप्त हुई। पिता रिटायर्ड सूबेदार वीरेंद्र विश्नोई को मयंक अपना प्रेरणास्त्रोत मानते थे। 

पिता एमए इकनॉमिक्स में 1978 में गोल्ड मेडलिस्ट रहे। बचपन से ही मयंक की सेना में जाने की इच्छा थी। मयंक के जज्बे को देखकर उसका मित्र अमन भी उन्हीं की राह पर चल पड़ा। तीनों दोस्त रनिंग, लांग जंप, हाई जंप आदि की छावनी क्षेत्र में प्रेक्टिस किया करते थे।
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मेजर मयंक विश्नोई व मेजर केतन शर्मा दाएं - फोटो : अमर उजाला
एक वर्ष में कंकरखेड़ा से दूसरी शहादत
देश की रक्षा के लिए एक वर्ष में कंकरखेड़ा निवासी दूसरे मेजर ने शहादत दी है। श्रद्धापुरी निवासी मेजर केतन शर्मा के बाद अब मेजर मयंक विश्नोई का शव भी तिरंगे में लिपटकर कंकरखेड़ा पहुंचा।
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब - फोटो : अमर उजाला
मेजर मयंक के घर में सुबह से ही शिवलोकपुरी के युवा और वृद्ध व्यवस्था बनाने में लगे रहे। कोई पुष्प तो कोई मार्ग में राष्ट्र ध्वज लगा रहा था। हर कोई अपने मित्र और पड़ोसी की शहादत को सलाम कर रहा था। शहीद का पार्थिव शरीर आने की सूचना पर शिवलोकपुरी में लोगों ने पाइपों से सड़कों को धोया और झाड़ू लगाई। घरों के बाहर खड़े दोपहिया और चार पहिया वाहनों को हटा दिया गया। घर तक पहुंचने के लिए चूने से निशान लगाए गए।

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फूलों की वर्षा करती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला
इस बीच वाल्मीकि बस्ती के कुछ युवा पुष्प खरीदने के लिए चंदा इकट्ठा करते रहे। घर के बाहर 150 से अधिक कुर्सियां लोगों के बैठने के लिए लगाई गईं, लेकिन वह भी कम पड़ गईं। ऐसे में मोहल्ले के लोगों ने अपने घरों के दरवाजे खोल दिए। किसी ने चारपाई तो किसी ने फोल्डिंग बिछाकर लोगों के बैठने की व्यवस्था की। 

क्षेत्र की महिलाएं सुबह से ही मयंक के घर पहुंच गई थी। परिवार को सांत्वना देने के लिए मेजर मयंक से जुड़ी अच्छी यादों को साझा कर रही थीं। रविवार होने के कारण सरकारी कर्मचारियों की छुट्टी थी, लेकिन आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले व्यापारी भी अपनी दुकानों पर नहीं गए। 
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शहीद मेजर मयंक विश्नोई की अंतिम यात्रा - फोटो : अमर उजाला
मेरठ में तिरंगे को सीने से लगाकर भीड़ के बीच एक कोने में खड़ी स्वाति की आंखों का पानी सूख चुका था। वह कभी रोती तो कभी गुमसुम सी खड़ी अपने पति मयंक को निहार रही थी। सैन्य अधिकारियों ने उसे समझाकर वहां से हटाया, तो स्वाति ने मयंक को सैल्यूट किया और 'आई लव यू' कहकर वहां से हट गई। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। उन्होंने भी मयंक को सैल्यूट किया। इसके बाद सैनिकों ने पार्थिव शरीर को चिता पर रख दिया, शहीद के पिता ने नम आंखों से बेटे को मुखाग्नि दी। ।
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