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Meerut: कोबरा और नेवले में 58 साल से चल रही है लड़ाई, यकीन नहीं तो खुद देखें ये तस्वीरें

Wed, 19 Oct 2022 04:39 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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सांप और नेवले की लड़ाई - फोटो : अमर उजाला
कोबरा और नेवले की लड़ाई आपने जरूर देखी होगी लेकिन ऐसी खूनी लड़ाई आपने शायद ही देखी होगी।  यूपी के मेरठ कॉलेज में 58 साल से कोबरा और नेवले में खूनी जंग चल रही है। जी हां, सुनने में अटपटा लगता है लेकिन 58 साल पहले हुई ये घटना आज भी जूलॉजी विभाग में जीवंत नजर आती है। यकीन नहीं होता तो देखें ये तस्वीरें और जानें क्या है इसकी असली कहानी :-

दरअसल, 58 साल पहले कोबरा और नेवले की इस खूनी जंग के दौरान मौत हो गई थी। दोनों की मौत के बाद इनको उसी स्थिति में संरक्षित करके रखा गया है जिसमें ये दोनों मिले थे। 
सिर्फ कोबरा और नेवला ही नहीं बल्कि 60 साल पहले जंगल में मिली लोमड़ी हो या फिर पेड़ पर लिपटा पाइथन। माछरा के एक गांव में सन 65 में जन्मे दो सिर वाले बालक से लेकर दूसरे दुर्लभ जीव यहां वर्षों से संरक्षित रखे हुए हैं। जूलॉजी के छात्र-छात्राएं इस लैब में आकर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं।
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पेड़ से लिपटा पायथन - फोटो : अमर उजाला
हम बात कर रहे हैं मेरठ कॉलेज के जूलॉजी म्यूजियम की। सन 1946 में बने जूलॉजी विभाग में इस म्यूजियम का उद्घाटन सन 1971 में हुआ था। ये सारे दुर्लभ जीव म्यूजियम में इससे पहले ही आ चुके थे। उस वक्त विभाग के प्रोफेसर, छात्र-छात्राएं और दूसरे लोग जंगलों से मृत जीवों को यहां लाकर संरक्षित करके रखते थे। 

 
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जूलॉजी विभाग में रखे कंकाल - फोटो : अमर उजाला


1972 में वन्य जीव अधिनियम बनने की वजह से यहां पर किसी भी मृत जीव को संरक्षित करके नहीं रखा गया। पिछले साल यूजीसी से मिली ग्रांट के बाद जूलॉजी म्यूजियम की पूरी तस्वीर बदल गई है। यहां कसेरूकी और अकसेरूकी संरक्षित जंतुओं का अच्छा खासा संग्रह मौजूद है। 

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जूलॉजी विभाग में रखे कंकाल - फोटो : अमर उजाला
बैल की अस्थियों का ढांचा या फिर ऊंट के शरीर की संरचना। महिला के शरीर के ढांचे से लेकर सन 65 में जन्में दो सिर वाले बच्चे को यहां संरक्षित करके रखा गया है। इसके अलावा यहां पर सांप, बिच्छू, मेंढक, मछली का अच्छा खासा संग्रह है।

 
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जूलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि म्यूजियम में दूसरे कॉलेजों के छात्र-छात्राएं भी समय लेकर आ सकते हैं। म्यूजियम में छात्र-छात्राओं के लिए अच्छा संग्रह है। 

 
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डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि पिछले साल यूजीसी से ग्रांट मिलने के बाद पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रेखा अग्रवाल के निर्देशन में म्यूजियम में काम कराए जाने के बाद अब यहां रखे गए हजारों स्पेसीमैन के बारे में सारी जानकारी छात्र-छात्राओं को कंप्यूटर पर एक क्लिक में मिल जाती है। 

उस वक्त इन जंतुओं का रहन-सहन, प्रवृत्ति, कौन कहां जंगल में कैसे मिला। इन सबकी जानकारी छात्रों को दी जाती है। डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि जूलॉजी म्यूजियम का नाम 'म्यूजियम ऑफ द वर्ल्ड  ऑफ गिग' जर्मनी में दर्ज है।
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विशेष रसायनों के जरिए वर्षों तक रहते हैं संरक्षित
मृत जंतुओं को फार्मलीन और गिलिसरीन के अलावा विशेष रसायनों में रखा जाता है। जिसके चलते ये वर्षों तक उसी स्थिति में रहते हैं, जिस स्थिति में ये मिले थे। कुछ स्पेसीमैन पर जिंक ऑक्साइड और दूसरे रसायनों का छिड़काव किया जाता है।

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