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Mathura Holi: बरसाना से नंदगांव पहुंचे हुरियारे, सुगंधित फूलों से बने रंग से रंगा तन-मन, घर-घर गूंजे मंगलगीत

Wed, 01 Mar 2023 03:56 PM IST
भूपेन्द्र सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा

सार




 
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नंदगांव में होली खेली गई - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश की तीर्थनगरी मथुरा में होली उत्सव जारी है। बुधवार को नंदगांव में होली खेली गई। 'फगुवा दै मोहन मतवारे, आजु भोर ही नंदपौर ब्रजवासिन कीच मचाई, बरसाने की गोपी फगुवा मांगन आईं, कियौ जुहार नंद जू कौं भीतर भवन बुलाईं' आदि पदों के तानों से नंदभवन गूंज रहा था। टेसू के सुगंधित फूलों से बनाया गया प्राकृतिक रंग नंदभवन में मौजूद हर किसी के तन-मन को अपने रंग में रंग रहा था। 

फगुवा दै, मोहन मतवारे फगुवा दै
फगुआ से पहले फिर हुयी लाठियों से प्रेमरस की वृष्टि
फगुवा मिस ब्रज सुंदरी जसुमति गृह आईं
तब ब्रजरानि बोलि कैं रावर में लीनी
मुसकि मुसकि कछु कहत हैं बतियां रंग भीनि
अहो जसुमति भोर ही याते हम आईं
केसरि कलस भराय कैं सब पर ढरकावैं
मृगमद केसर घोरि कें मुख सौं लिपटावै
मनभावन फगवा लियौ तनसुख की सारी


अबीर गुलाल के रंग बिरंगे बादल घुमड घुमड कर नंदभवन में पहुंच रहे लोगों का स्वागत कर रहे थे। चारों ओर ढोल, नगाडे, ढप आदि वाद्य यंत्रों पर लोग थिरक रहे थे। रंगीली गली और लठामार होली चौक पर लाठियां बरसने की आवाज हर किसी को अपनी ओर खींच रही थी। ऐसा नजारा था बुधवार को मथुरा जिले के नंदगांव का जोकि भगवान श्री कृष्ण का है।
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बरसाना से नंदगांव पहुंचे हुरियारे - फोटो : अमर उजाला
द्वापर में जब फागुन सुदी नवमी को भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ होली के बाद बिना कोई फगुवा (उपहार) दिए बरसाना से नंदगांव आ गए थे तो बरसाना में सभी गोप-गोपियों ने बैठक की। बैठक में निर्णय लिया गया कि फगुवा लेने के लिए नंदगांव नंदभवन चलना चाहिए। अगले दिन दशमी को बरसाना के गोपी ग्वाल जुर मिल कर फगुवा लेने के लिए नंदभवन आते हैं। यहां द्वार पर खडे होकर कहती हैं फगुवा दै मोहन मतवारे फगुवा दै। फगुवा के बहाने एक बार फिर नंद के गांव में होली होती है। फाग महोत्सव की इसी लीला को साकार करने के लिए बरसाना के बाद नंदगांव में लठामार होली का आयोजन बुधवार को किया गया। 

बुधवार की दोपहर करीब दो बजे से ही बरसाना से राधारानी सखी स्वरूप बरसाना से हुरियारों का आगमन शुरू हो गया है। यशोदा कुंड पर चकाचक रबडी, केसर युक्त भांग ठंडाई छानी गई। नंदगांव के लोगों द्वारा भव्य स्वागत सत्कार किया है। जैसा कि पहले से अंदेशा था कि लाठियां बरसने वाली हैं तो इसके लिए सिर पर पगड़ी बांधी गई। कुंड से बाहर निकलकर एकत्रित हो ढालों को उपर करते हुए नंद के जमाई की जय से गगनभेदी जयघोष करते हुए भूरे का थोक से नंदभवन की ओर हुरियारे कूच कर रहे हैं। 
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छत से रंग बरसाते लोग - फोटो : अमर उजाला
भूरे का थोक में गुलाब की पंखुडियों से जोरदार स्वागत किया गया। जगह जगह फूलों से रंगोली सजाई गई। छतों से सैंकडों ड्रमों में पहले से तैयार किया गया टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग हुरियारों पर बरसाया जा रहा था। हर कोई अद्वितीय प्रेम के इस रंग में सराबोर होने के लिए मचल रहा था। हुरियारों के झुंड के झुंड हुरियारिनों से इशारा कर कर के कह रहे हैं कि दर्शन दै निकस अटा में ते दर्शन दै। लहंगा चुन्नी और सोलह श्रृंगारों से सजी धजी हुरियारिनें अपने घर के द्वार, अटा अटरियाओं के झरोखों से झांकने लगीं। भंग की तरंग में मदमस्त हुरियारे हंसी ठिठोली करते हुए नंदभवन पहुंचे। 

नंदभवन में पहुंचते ही पहले से ताक में बैठे नंदगांव के ग्वालों ने बरसाना के हुरियारों पर पिचकारी, बाल्टियों से टेसू के फूलों के रंग से उनको सराबोर कर दिया। चारों ओर नंदभवन में विभिन्न रंगों की सतरंगी छटा छा गई। नंदगांव बरसाना के समाजियों ने कृष्ण-बलराम के विग्रहों के सामने संयुक्त समाज गायन किया। तमाम परम्परागत रीति-रिवाजों के बाद शुरू होती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली। शाम के करीब साढ़े पांच बजे रंगीली चौक पर हजारों की संख्या में हुरियारे और हुरियारिन जमा हुए। 

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ड्रम में घोला गया प्राकृतिक फूलों से बना रंग - फोटो : अमर उजाला
इसके बाद वे नृत्य व गायन प्रस्तुत करते हैं। चंदा छिपमत जईयौ आज, श्याम संग होरी खेलुंगी, नैनन में मोहे गारी दई पिचकारी दई होरी खेली न जाय। इस तरह के तमाम लोकगीतों पर हुरियारे और हुरियारिन नृत्य करते कन्हैंया की अलौकिक लीला में मगन हो जाते हैं। संध्या को समाजियों का आदेश हो जाने पर प्रेम भरी लाठियों की बरसात शुरू हो जाती है। बीच-बीच में वहां पर मौजूद अन्य भक्तों पर भी प्रेम पगी लाठियां दुलार दिखाती रहीं। लोग छतों से यह नजारा देख लालायित हो रहे थे।
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नंदगांव की लठामार होली का महत्व

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होली खेलते हुरियारे - फोटो : अमर उजाला
कृष्णकाल में भगवान श्री कृष्ण फागुन सुदी नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग )दिए ही वापस लौट आए। बरसाना की गोपियों ने कन्हैंया से होली का फगुवा लेने के लिए नंदगांव जाने की सोची। इसके लिए राधाजी ने  बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैंया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। बस फिर क्या, अगले दिन ही यानि दसमी को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव आती हैं। इस लीला से जुडे पदों का नंदभवन समाज में गायन होता है।

दसमी दिन आ बरसाने हुरियारिन आ नंदगांम सजीं समकीलि
कल कौ बदलौ अज देंय चुकाय बराबर हो कह गोरी रसीली
रस रंग मिलै फगवा हू मिलै बन गोपन भेष बना गरबीली
बरसानियां इत नंदगांम समाज जुरयौ नंद भौन मनाय रंगीली
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मंगलगीतों से हुरियारों का स्वागत

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लाठियों से प्रहार के बाद नंदबाबा से लिया आशीर्वाद - फोटो : अमर उजाला
नंदगांव में हुरियारे और हुरियारिनों द्वारा पहली बार होली खेलने पर घर-घर मंगलगीत गवाए गए। इस दौरान मिठाइयां बांटी गईं। 

लाठियों से प्रहार के बाद नंदबाबा से लिया आशीर्वाद

लठामार होली समापन के पश्चात हुरियारिन नंदबाबा मंदिर पहुंची। यहां नंद परिवार के दर्शन किए। इसके बाद घर पहुंचने पर सास, ननद, ससुर, पति एवं बडे बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। 
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बिंदी चूडियों वाले हाथों ने खूब चलाई लाठियां

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नंदीश्वर पर्वत की परिक्रमा कर मांगी मनौती - फोटो : अमर उजाला
नारी को भले ही अबला कहा जाता है लेकिन नंदगांव की होली देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि बिंदी चूडियों वाले हाथ आत्मरक्षा में भी सक्षम हैं। लठामार होली से पहले हुरियारिनों ने पूरी तरह से श्रृंगार किया। रात्री में महंदी लगाई। लाठियों को एक बार फिर तेल पिलाया गया। 

नंदीश्वर पर्वत की परिक्रमा कर मांगी मनौती

एक तो कृष्ण का गांव उस पर भी फागुन महोत्सव। भला ऐसे मौंके को कौन छोड सकता है। दूर दराज से आए हजारों श्रद्धालुओं ने नंदगांव की परिक्रमा की। इस दौरान श्री कृष्ण के लीला स्थलों के जी भर कर दर्शन किए। 

रात भर चला नृत्य गायन

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हुरियारिन उछलकर लाठियां मारतीं तो हुरियारे प्रहारों को रोकते - फोटो : अमर उजाला
लठामार होली के समापन के बाद रात्री में जगह जगह होली रसियाओं का आयोजन हुआ। हर चौक पर महफिल सजाई गईं। रसियाओं की धुनों पर मदमस्त होकर नृत्य किया। 

सह रहे चोट ग्लाव ढालन पै

गोपियों ने जैसे ही उछल उछल कर लाठियों से प्रहार करना शुरू किया वैसे ही हुरियारों ने भी अपने करतब दिखाना शुरू कर दिया। हुरियारिन उछल कर लाठियां मारतीं तो हुरियारे मयूरी नृत्य कर लाठियों के प्रहारों को रोकते। मयूरी नृत्य की फिरकनी से हुरियारिनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। 

कनक पिचकारियों और फूलों की छडियों का वर्तमान स्वरूप है लठामार होली

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नंदगांव में खेली गई लठामार होली - फोटो : अमर उजाला
फाग महोत्सव ब्रज में सबसे लम्बा चलने वाला महोत्सव है। श्री राधाकृष्ण का अनुराग युक्त वासना मुक्त प्रेम का प्रतीक है होली। द्वापर में जब कृष्ण और उनके सखा राधा और उनकी सखियों से होली खेलने बरसाना जाते थे तो जब देर शाम तक कृष्ण सखाओं संग होली चोलते रहते थे तो राधा और उनकी सखियां फूलों से सुसज्ज्ति छडियों से कृष्ण और उनके सखाओं को भगाती थीं। उन छडियों के प्रहारों को कृष्ण और उनके सखा सोने की पिचकारियां से रोकते थे। 

होली के साथ महिलाओं को सबला बनाने का प्रशिक्षण भी है यह उत्सव

बरसाना की होली में आज कनक पिचकारियों का स्थान ढालों ने और पुष्प जडित छडियों का स्थान बांस की मोटी मोटी लाठियों ने ले लिया है। ढाल और लाठियों के चलन वाली होली लगभग 6 शतक पुरानी बताई जाती है। यह होली अबला कही जाने वाली महिलाओं को सबला बनाने का प्रशिक्षण भी है। अब बात करते हैं नंदगांव की लठामार होली की। नंदगांव बरसाना में फाग महोत्सव की समाज में उल्लेख मिलता है कि फगवा मिस ब्रज सुंदरी जसुमति ग्रह आईं। यानि फगुवा मांगने के लिए ब्रजवालाएं यशोदा जी के घर आती हैं। 
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नंदमहल से सभी ब्रजबालाओं को दिया जाता फगुवा - फोटो : अमर उजाला
नंदभवन में जमकर हंसी ठिठोली होती है। एक संदेसो जायकें कीरति सौं कहिए, नंदराय ढिंग आय कैं कोउ दिन रहिए। हंसी ठिठोली के बाद फिर केसर आदि से रंग होली होती है। केसरि कलस भराय कैं सब पर ढरकावैं, मृग मद केसरि घोर कैं मुख सौं लिपटावैं। इसके बाद फिर नंदमहल से सभी ब्रजबालाओं को फगुवा दिया जाता है। मन भायौ फगुवा लियौ, तनसुख की सारी, अंक माल सब के हियै दीनी दुरि न्यारी। 

द्वापर की इसी परंपरा को आज भी नंदगांव बरसाना के लोग निभाते चले आ रहे हैं। बरसाना के लोग जब फगुवा मांगने आते हैं तो द्वापर की तरह ही होली खेलनी पडती है। इस होली में उन पर टेसू के फूलों का रंग, विभिन्न प्रकार के पुष्प और लाठियां बरसाई जाती हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो नंदगांव बरसाना की होली देखने में तो समान लगती है, परन्तु अंतर भाव का है।

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