सन् 1960 से 1980 के आसपास यूपी के कानपुर शहर में रंगमंच का स्वर्णिम दौर था। अस्सी के दशक में विजय तेंदुलकर के नाटक सखाराम बाईंडर और बब्बन खान के नाटक अदरक के पंजे को देखने के लिए थियेटरों में भारी भीड़ उमड़ी थी। तब इनके टिकट की कीमत 15 रुपये थी। इसे खरीदने के लिए लंबी कतारें लगी थीं। दर्शकों की रुचि के चलते मर्चेंट चैंबर हॉल में सखा राम बाईंडर का पांच दिन और अदरक के पंजे का सात दिन तक मंचन हुआ था। रंगमंच की रंगीन दुनिया 1990 के बाद दम तोड़ने लगी। सरकार की अनदेखी, इंटरनेट और आधुनिक फिल्मों के दौर ने रंगमंच को तगड़ा नुकसान पहुंचाया। रंगमंच कर्मी गुमनामी के अंधेरे में खो गए। हाल में ही शहरियों का रुख फिर थियेटरों की ओर हुआ है। इसे इस कला के लिए संजीवनी माना जा रहा है। हालिया वर्षों में कई नाटक भीड़ जुटाने में सफल रहे हैं।
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डेमो पिक
अनुकृति संस्था के डॉ. ओमेंद्र कुमार बताते हैं कि सन् 1960 में करीब दो दर्जन नाट्य संस्थाएं थीं। सन् 1990 में थियेटरों का बुरा दौर शुरू हो गया था। अब एक बार फिर से अच्छा दौर लौट रहा है। 2008 से 2011 के बीच बकरी और मोटेराम का सत्याग्रह नाटक दर्शकों को काफी पसंद आए थे। इसके बाद शहर में नाटकों की संख्या बढ़ने लगी है। अब वर्ष में करीब आठ से दस नाटक शहर में हो रहे हैं। जनवरी से अब तक तीन नाटकों का सफल मंचन हो चुका है। लाजपत भवन में डैड्स गर्लफ्रेंड और रागेंद्र स्वरूप आडिटोरियम में रांग नंबर नाटक में दर्शकों की काफी भीड़ जुटी थी। अच्छे दर्शक मिलने के कारण अब कई टीवी और फिल्मों के कलाकार भी यहां आने लगे हैं। 24 जून को प्रजा ही रहने दो नाटक के टिकट तो बकायदा वेबसाइट के जरिए बुक किए गए। टिकट बुकिंग से करीब 10 हजार रुपये जुटाए गए। नाटक देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे थे।
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सजावट व परिधान भी बदल गए
पहले थियेटर में जहां केवल स्पॉट लाइट और बेबी लाइट होती थी वहीं अब ये एलईडी लाइट से सजाए जा रहे हैं। स्टैंडिंग माइक की जगह कार्डलेस, कॉलर, बटन और फ्लोर माइक ने ले ली है। यहीं नहीं परिधानों में भी काफी बदलाव आया है। अब इसके लिए अच्छा-खासा पैसा खर्च किया जा रहा है।
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शबाना आजमी और फारुख शेख
फिल्मी कलाकार भी आ चुके
हालिया वर्षों में अनुकृति संस्था की ओर से तुम्हारी अमृता प्ले का मंचन लाजपत भवन में हुआ था। इसमें शबाना आजमी और फारुख शेख ने अभिनय किया था। इसके अलावा एक अन्य नाटक सालगिरह के मंचन में अनुपम खेर और किरण खेर ने भाग लिया था। वहीं, मां अब रिटायर होती है नाटक के मंचन में शबाना आजमी, ग्रुशा कपूर, अवतार गिल ने अभिनय किया था।
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इन प्ले से मचा था हड़कंप
कानपुर शहर में सत्य घटना पर आधारित नाटक कमला से हड़कंप मचा था। प्ले के दौरान हंगामा न हो इसके लिए थियेटर के बाहर पुलिस फोर्स तैनात था।
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मंचन से जुड़ी संस्थाएं और कलाकार
तक्षशिला, शिल्पी, दर्पण, नाट्यांगन, इप्टा, अनुभूति, अलंकृत, कलानयन, अंबेस्डर, नाट्यभारती, सीजीडब्लू सीसी संस्थाएं काफी प्रसिद्ध रहीं। एनके नेभ, राधेश्याम दीक्षित, जॉली घोष, तृप्ती राघव, विजय बनर्जी, कंचन, रतन राठौर, ममता सक्सेना काफी प्रसिद्ध हुए। वहीं राकेश चतुर्वेदी, राकेश डग, ज्ञानदेव अग्निहोत्री, निशा गुप्ता जैसे कलाकारों ने बॉलीवुड में अपनी धाक जमाई।
रंगमंच को इससे लगा झटका
- बढ़ती महंगाई के कारण 300 रुपये में बुक होने वाले थियेटरों की कीमत अब 35 हजार के लगभग हो गई है।
- इंटरनेट के जमाने में थियेटर देखना युवाओं ने कम कर दिया है। पहले अभिनय सीखने के लिए बड़ी संख्या में युवा जुटते थे।
- सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता राशि बीच में बंद हो गई थी। वर्ष 2011 से अनुदान मिलना शुरू हुआ।