विक्रम कोठारी पर विभिन्न बैंकों की पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक की बकायेदारी को आजादी के बाद शहर का सबसे बड़ा बैंकिंग फ्रॉड माना जा रहा है। 100 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले उद्योगपति को पांच हजार करोड़ का लोन दिए जाने पर सीबीआई के भी कान खड़े हो गए हैं।
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विक्रम काेठारी
दो दिन की जांच के बाद सीबीआई के रडार पर वे बैंक अफसर भी आ गए हैं जिन्होंने कोठारी को लोन दिए जाने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई। इसके अलावा सीबीआई ने रिजर्व बैंक के अफसरों और कोठारी के लोन से जुड़े बैंकों के ऑडिटरों पर भी शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। बीते 10 सालों में कंसोर्टियम की सात बैंकों में कई बार ऑडिट हुआ लेकिन इस अनियमितता को नहीं पकड़ा जा सका।
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सीबीआई को आशंका है कि इस फ्रॉड को जानबूझ कर दबाने का प्रयास किया गया। बैंकों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि कोठारी कांड बैंक अफसरों की मिलीभगत के बगैर संभव नहीं है। लोन संबंधी घपलेबाजी पकड़ने के लिए बैंकों की खुद की टीमें होती हैं। अलग-अलग शाखाओं का नियमित रूप से आंतरिक ऑडिट करती हैं।
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इसके अलावा रिजर्व बैंक की गाइड लाइन के मुताबिक पेशेवर ऑडिटरों से भी ऑडिट कराया जाता है। इन ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा रिजर्व बैंक भी करता है। इतनी कड़ी मॉनीटरिंग का दावा करने के बाद भी बैंकों में इस तरह के फ्रॉड सामने आने से रिजर्व बैंक की भूमिका और साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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सीबीआई को संदेह इस बात का है कि समय रहते ऐसे प्रकरणों को जिम्मेदार एजेंसी संज्ञान में क्यों नहीं ले रही है। सूत्र बताते हैं कि सीबीआई ने कोठारी को लोन देने वाले बैकों से अब तक हुए ऑडिट की सभी रिपोर्ट मांगी हैं।
इसके अलावा किस वर्ष में किस ऑडिटर और रिजर्व बैंक के किस अधिकारी ने लोन संबंधी दस्तावेजों की जांच की, उसकी भी जानकारी मांगी है। बताया जा रहा है कि कानपुर के इस महा घोटाले में कई बैंकों के आला अफसरों पर बहुत जल्द शिकंजा कसा जाएगा।