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एशियन गेम्स खिलाड़ी ज्योति शुक्ला ने यहां लड़कियों के मां-बाप को दिया 'बड़ा संदेश'

Mon, 03 Sep 2018 01:49 PM IST
पुलकित तिवारी, अमर उजाला, कानपुर

सार

- पढ़ाई की तरह खेलों के लिए भी प्रेरित करें मां-बाप
- जकार्ता से लौटने के बाद अमर उजाला कार्यालय आईं एशियाड खेलने वाली शहर की पहली खिलाड़ी ज्योति शुक्ला
- हैंडबॉल खिलाड़ी ज्योति ने कहा अभिभावक पढ़ाई की तरह बच्चों पर खेल के अभ्यास का भी बनाएं दबाव
- बोलीं, शहरों में प्रतिभाओं की कमी नहीं बस मौकों की तलाश, देश में हैंडबॉल की सुविधाओं से खुश नहीं हैं ज्योति
 
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एशियन गेम्स खेलने वाली शहर की पहली खिलाड़ी ज्योति शुक्ला की कहानी
एशियाड में खेलने वाली कानपुर की पहली महिला हैंडबॉल खिलाड़ी ज्योति शुक्ला का मानना है कि बच्चों को पढ़ाई की तरह खेल के लिए भी प्रेरित किया जाए तो शहर से और भी प्रतिभाएं निकलकर सामने आएंगी। बच्चों पर हमेशा पढ़ाई का दबाव बनाया जाता है, यही दबाव खेल के अभ्यास के लिए भी होना चाहिए। अपने शहर में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है बस मौके की तलाश है। 

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- हमारी बेसिक सुविधाएं थोड़ी मजबूत हो जाएं...
 
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ज्योति शुक्ला
जकार्ता से लौटने के बाद ज्योति रविवार को फजलगंज स्थित अमर उजाला कार्यालय पहुंचीं। यहां ज्योति ने कहा हमारे देश में हैंडबॉल को बेसिक स्तर पर सुविधाएं नहीं मिलती हैं। इसकी वजह से ही निराशा हाथ लगी है। यदि हमारी बेसिक सुविधाएं थोड़ी मजबूत हो जाएं तो हमारी टीम भी अन्य देशों की तरह हैंडबॉल में तरक्की कर सके। दूसरे देशों के लोग इनडोर गेम खेलते हैं और गम का इस्तेमाल करते हैं। हम लोग खुले मैदान में खेलते हैं, धूल की वजह से गम का इस्तेमाल करने का कोई मतलब नहीं रहता। जब कभी कैंप में जाते हैं तभी गम लगाकर अभ्यास कर पाते हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं होता और हम सामने वाली टीम के आगे कमजोर पड़ जाते हैं।

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- विदेशी खिलाड़ी जूतों में भी इस गम का इस्तेमाल करते हैं...
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ज्योति शुक्ला के माता- पिता
ज्योति ने बताया कि गम हाथ में लगाने से बॉल चिपककर आती है। उसे फेंकने के लिए भी मजबूत पकड़ बनती है। विदेशी खिलाड़ी तो जूतों में भी इस गम का इस्तेमाल करते हैं। हम लोगों को ज्यादा अनुभव नहीं होता और गम कभी ज्यादा तो कभी कम लग जाता है। इससे भी खेल प्रभावित होता है। इस दौरे में जब पता चला कि हमारा मुकाबला मेडलिस्ट टीम साउथ कोरिया, चाइना, कजाकिस्तान, व नार्थ कोरिया से है, तभी लगने लगा था कि मेडल लाना बहुत मुश्किल होगा। ज्योति के साथ मां मीरा देवी, पिता शिव शंकर, कोच अतुल, दोस्त आकांक्षा और उनकी मां सावित्री भी अमर उजाला कार्यालय पहुंची। 

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- मेडल न ला पाने का नहीं पहला मैच हारने का दु:ख ...

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ज्योति शुक्ला
ज्योति शुक्ला ने कहा कि मेडल न ला पाने का इतना दु:ख नहीं है, जितना पहला ही मैच हारने का है। उनकी टीम के चार टीमों से छह मुकाबले हुए। इसमें दो मैच ही टीम जीत सकी। एक मैच मालद्वीव से दूसरा मलेशिया से जीता। उत्तर कोरिया के खिलाफ भी उनका अच्छा प्रदर्शन रहा लेकिन मैच नहीं जीत सके। ज्योति ने कहा कि वह कई दिन बाद घर लौटी है, अच्छा लग रहा है।

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- नवंबर में जापान से मेडल लाना लक्ष्य...
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ज्योति शुक्ला
ज्योति ने बताया कि नवंबर में जापान में एशियाड चैंपियनशिप होने जा रही है। जापान से मेडल जीतकर लाना उनका लक्ष्य है। जो गलतियां जकार्ता में हुई उन्हें ठीक करने के लिए पूरे दो माह का समय है। मेहनत करूंगी और मेडल लेकर लौटूंगी।

आगे की स्लाइड में पढ़ेंः-साइकिल से आती थी अभ्यास के लिए : कोच...
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एशियन गेम्स खेलने वाली शहर की पहली खिलाड़ी ज्योति शुक्ला की कहानी
कोच अतुल व रजत दीक्षित ने बताया कि ज्योति के अंदर सीखने का जुनून था। ज्योति हैंडबॉल सीखने के लिए 2007 में साइकिल से विजय नगर से बर्र्रा विश्व बैंक आती थी। मैदान में पोल न लगने के कारण ज्यादा देर तक अभ्यास नहीं कर पाते थे। इसके लिए धरना प्रदर्शन किया गया था। ज्योति भी सात दिन तक धरने में बैठी थी। 
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