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Mahashivratri: बरेली के नाथ मंदिरों की महिमा अपरम्पार, गौरीशंकर और पंचेश्वर महादेव भी आस्था के प्रमुख केंद्र

Wed, 26 Feb 2025 07:38 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली

सार

बरेली के सात शिवालय शहर को नाथ नगरी की पहचान देते हैं। मान्यता है कि नाथ मंदिरों में पहुंचने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। जानिए इन मंदिरों की महिमा और इतिहास...
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बरेली के नाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
बरेली में भगवान शिव के सात नाथ मंदिर आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन शिव मंदिरों के नाम हैं त्रिवटीनाथ मंदिर, वनखंडीनाथ मंदिर, अलखनाथ मंदिर, तपेश्वरनाथ मंदिर, मढ़ीनाथ मंदिर, धोपेश्वर नाथ मंदिर और पशुपतिनाथ मंदिर। ये सातों शिवालय शहर को नाथ नगरी की पहचान भी देते हैं। मान्यता है कि यहां पहुंचने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसके अलावा गुलड़िया स्थित गौरीशंकर और पचौमी स्थित पंचेश्वर शिव मंदिर भी प्राचीन शिवालय हैं। इन मंदिरों की स्थापना के पीछे भी कई रोचक पहलू हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर हम इन सातों नाथ मंदिरों के महात्म्य को बता रहे हैं। 
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बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
त्रिवटीनाथ मंदिर- शहर के उत्तर दिशा में स्थित इस मंदिर की स्थापना 1474 में हुई थी। बताया जाता है कि उस वक्त यहां वन क्षेत्र था। एक चरवाहा तीन वट वृक्षों के नीचे विश्राम कर रहा था। उसके स्वप्न में भगवान भोलेनाथ आए और उस स्थान की खोदाई करने के लिए कहा। वहां खोदाई की तो शिवलिंग प्रकट हुए। तीन वटों के नीचे शिवलिंग मिलने से इस मंदिर का नाम त्रिवटीनाथ पड़ गया।
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वनखंडीनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
वनखंडीनाथ मंदिर - ऐसी मान्यता है कि द्रौपदी ने पूर्व दिशा में अपने गुरु के आदेश पर शिवलिंग स्थापित कर कठोर तप किया था। उस समय जोगीनवादा क्षेत्र में घना जंगल होता था। इस कारण मंदिर का नाम वनखंडीनाथ पड़ गया। ऐसा कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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बाबा अलखनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
अलखनाथ मंदिर : आनंद अखाड़ा के अलखिया बाबा ने इस स्थान पर कठोर तप किया। शिवभक्तों के लिए अलख जगाई। उन्हीं के नाम से जोड़कर इस मंदिर का नाम अलखनाथ पड़ा। मंदिर में सुबह से ही भक्तों की लाइन लग जाएगी। तीन बजे से मंदिर में जलाभिषेक की शुरुआत होगी। ऐसे में तमाम साधु-संतों और अन्य लोगों ने बाबा की इस तपस्थली में शरण ली।
 
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बाबा तपेश्वरनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
तपेश्वरनाथ मंदिर : शहर के दक्षिण दिशा में स्थित यह मंदिर ऋषियों की तपोस्थली रहा। उन्होंने कठोर तप कर इस देवालय को सिद्ध किया। इसलिए इसका नाम तपेश्वरनाथ मंदिर पड़ा। सुभाषनगर में स्थित मंदिर में शिवालय के अलावा तमाम देवी देवताओं की मूर्ति स्थापित है। यहां पर महाशिवरात्रि और सावन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
 
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बाबा मढ़ीनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
मढ़ीनाथ मंदिर : यह मंदिर शहर के पश्चिम दिशा में स्थित है। इसकी उत्पत्ति के बारे में एक कथा है। बताते हैं कि एक तपस्वी ने राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए यहां कुआं खोदना शुरू किया था, तभी शिवलिंग प्रकट हुआ। ऐसा शिवलिंग जिस पर मढ़ीनाथ सर्प लिपटा था। उसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई और नाम रखा गया मढ़ीनाथ। अब इस मंदिर के आसपास के क्षेत्र को मढ़ीनाथ मोहल्ला के नाम से जाना जाता है।
 
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धोपेश्वर नाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
धोपेश्वर नाथ मंदिर : पूर्व दक्षिण अग्निकोण में स्थापित इस मंदिर को महाराजा द्रुपद के गुरु व अत्री ऋषि को शिष्य ध्रुव ने कठोर तप से सिद्ध किया। उन्हीं के नाम पर देवालय का नाम धोपेश्वर नाथ पड़ा। श्रावण माह व शिवरात्रि पर यहां भक्ताें की भीड़ लगी रहती है।

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पशुपतिनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
पशुपतिनाथ मंदिर : नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर पीलीभीत बाइपास-बीसलपुर चौराहा के पास बना पशुपतिनाथ मंदिर लोगों में आस्था के साथ ही पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गया है। मंदिर में रामेश्वरम के रामसेतु से लाए गए पत्थर यहां तालाब में तैरते हैं। मंदिर परिसर में शिव के 108 नामों को समर्पित 108 शिवलिंग हैं।


 

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गौरीशंकर मंदिर, गुलड़िया - फोटो : अमर उजाला
गुलड़िया गौरीशंकर : गुलड़िया स्थित गौरीशंकर मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है। मान्यता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। इसमें भगवान शंकर-पार्वती की संयुक्त प्रतिमा है। महाशिवरात्रि पर भक्तों को भीड़ होती है। उनके दर्शन से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। पुजारी ने बताया कि भक्त यहां मनोकामना लेकर आता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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पंचेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला
पंचेश्वर महादेव मंदिर : मान्यता है कि पचौमी स्थित पंचेश्वर शिव मंदिर में पांडवों ने विश्राम किया था। वनवास के दौरान वह यहां पर आए थे। अज्ञातवास पर पांचाल (आंवला) से निकले तो जहां विश्राम लिया, वहां भगवान शिव की साधना करने लगे। अपने कष्टों को दूर करने के लिए उन्होंने कठिन पूजा-अर्चना की थी। पांडवों ने जिन स्थान पर शिव साधना की, वहां बड़ा शिवालय बना दिया गया। यह पाषाण प्रतिमा सदियों पुरानी बताई जा रही है।
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