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गांधी जयंती पर विशेष : बापू ने दिया प्रमाण पत्र, उसने सालों लगाए रखा सीने से

Sat, 02 Oct 2021 03:51 PM IST
विनोद सिंह अनिल सिद्धार्थ, प्रयागराज

सार

  • नाई के मांगने पर महात्मा गांधी ने दिया था हस्तलिखित सर्टिफिकेट, पहली बार होटल, फिर हर बार आनंद भवन में ही रुके, अलग था उनका कमरा, आज भी सुरक्षित है पलंग, पूजा के बर्तन, सूत तथा चरखा, तीन बंदरों की मूर्तियां
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महात्मा गांधी - फोटो : Facebook/MokamOfficial
महात्मा गांधी का प्रयागराज से गहरा लगाव रहा। दक्षिण अफ्रीका से लौटने और संगम में अस्थि विसर्जन के साथ अंतिम विदाई के बीच इलाहाबाद से पूरे 51 बरस सात महीने सात दिनों के रिश्ते के दौरान उनके आने का क्रम बना ही रहा। गांधी जी के इलाहाबाद से जुड़े तमाम प्रसंगों में से एक बेहद रोचक यह भी है कि आनंद भवन में उनकी दाढ़ी बनाने आए नाई ने पारिश्रमिक के तौर पर उनसे हस्तलिखित सर्टिफिकेट मांग लिया था। इसके अलावा यहीं इलाहाबाद में गांधी ने पहली बार स्वराज का ‘बीज मंत्र’ दिया था, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिल गई थीं। इसी संगम किनारे उन्होंने ‘प्रकृति से जरूरत भर ही लेने’ का जो सूत्रवाक्य दिया, वह आज दुनिया के लिए ‘क्लाइमेट जस्टिस’ का सिद्धांत बन गया है। 

प्रो.राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भइया’ राज्य विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष और गांधी दर्शन के अध्येता डॉ.अविनाश कुमार श्रीवास्तव बतातेे हैं, महात्मा गांधी आमजनों से मिलने को बहुत उत्सुक रहते थे। एक बार आनंद भवन में उनकी दाढ़ी बनाने के लिए जिस नाई को बुलाया गया था, उसने दाढ़ी बनाने केबाद उनसे पारिश्रमिक की जगह सर्टिफिकेट मांगा। और फिर गांधी जी ने उसे हाथ से लिखकर प्रशस्ति पत्र दिया था, जिसे वह बहुत दिनों तक अपनी दुकान पर टांगे रहा। महात्मा गांधी से मुलाकात केदौरान राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी उनसे इस घटना का जिक्र किया था।
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महात्मा गांधी जयंती - फोटो : Amar ujala
दवा लेने तांगे से गए थे जानसेनगंज
पहली बार 5 जुलाई 1896 को दक्षिण अफ्रीका से एसएस पंगोला जहाज से कोलकाता और फिर राजकोट जाते हुए इलाहाबाद पहुंचने से पहले ही उन्हें जबर्दस्त पेट दर्द हुआ। ट्रेन इलाहाबाद स्टेशन पर तकरीबन पौन घंटे रुकती थी। ऐसे में वह दवा लेने के लिए ट्रेन से उतरकर तांगे से जानसेनगंज की ओर चल पड़े लेकिन लौटने में देरी होने से ट्रेन छूट गई। अब गाड़ी दूसरे दिन ही जाती थी, सो मजबूरी में उन्होंने होटल कैलनर में रात गुजारी। इस बीच समय का सदुपयोग करते हुए वह पॉयनियर के दफ्तर गए और संपादक चेजनी से मुलाकात कर उन्हें दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के बारे में जानकारी थी।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी - फोटो : gandhi.gov.in
चेजनी ने उनकी बातें सुनने के बाद भरोसा दिलाया, ‘आप जो कुछ भी लिखेंगे, मैं उस पर तुरंत टिप्पणी करूंगा।’ इसके बाद गांधी जी संगम स्नान और शहर घूमने के लिए भी गए। प्रवास के दौरान ही उन्होंने ‘ग्रीन पंफलेट’ की रचना का संकल्प लिया। लेकिन इसके बाद वह जब भी आए, हर बार आनंद भवन में ही ठहरे। उनके लिए आनंद भवन में एक अलग कमरा ही था। इलाहाबाद आने पर वह उसी कमरे में ठहरते थे। इस कमरे में आज भी उनके चित्रों के अतिरिक्त उनकी ओर से प्रयोग की गई पलंग, कुर्सी, मेज, कपड़े, पूजा के बर्तन, सूत और चरखा तो सुरक्षित है ही, कमरे में तीन बंदरों की मूर्तियां भी हैं।

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महात्मा गांधी - फोटो : Social Media
सात लाख तीस हजार रुपये में बिकी थी तस्वीर
अंतर्राष्ट्रीय पटल पर गांधी से इलाहाबाद का रिश्ता तब रेखांकित हुआ था, जब ऑन लाइन नीलामी के तहत भारतीय कला बाजार में गांधी से जुड़ी एक तस्वीर सात लाख तीस हजार रुपये में बिकी थी। यह आनंद भवन के उस कमरे की तस्वीर थी, जहां इलाहाबाद आने पर गांधीजी ठहरते थे। ‘गांधीज रूम’ की ब्लैक ऐंड व्हाइट तस्वीर की धमक के साथ इलाहाबाद दुनिया के पटल पर चमका था।
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महात्मा गांधी
कांग्रेस की बैठक से लेकर अधिवेशन, कमला नेहरू अस्पताल का उद्घाटन और विजयलक्ष्मी पंडित तथा इंदिरा गांधी के विवाह समारोह आदि में उनका आना लगा ही रहा। स्वरूपरानी नेहरू के विवाहोत्सव के बाद उन्होंने यहां की महिलाओं से स्वदेेशी अपनाने की अपील की थी। स्वरूपरानी नेहरू के विवाह के बाद 10 मई 1921 को पांचवी बार जब वह कांग्रेस जिला सम्मेलन में शामिल होने इलाहाबाद  पहुंचे तो सहज ही बोले उठे, ‘प्रयाग तो अब मुझे अपने घर जैसा ही लगता है।’
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