आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के 85वें दीक्षांत समारोह में एक बार फिर बेटियों का दबदबा रहा। छात्राओं पर एक तरह से पदकों की बरसात हुई। 81 फीसदी पदकों पर उन्होंने कब्जा किया। छात्र महज 19 फीसदी पदक ही पा सके। हरियाणा की डॉक्टर आकांक्षा ने पहला स्थान हासिल किया। उन्हें 11 पदक मिले। संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर आगरा की मनिंदर कौर और मथुरा की चंचल रहीं।
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छात्रा को गोल्ड मेडल प्रदान करतीं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल
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दीक्षांत समारोह में 81 फीसदी पदक छात्राओं को मिलने पर मुख्य अतिथि राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने खुशी जाहिर की। राज्यपाल ने छात्राओं को स्वस्थ और सशक्त बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक बेटियां स्वस्थ नहीं होंगी, तब तक देश कुपोषण मुक्त नहीं हो सकता।
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पदक मिलने के बाद खुशी जाहिर करतीं छात्राएं
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शुक्रवार को दीक्षांत समारोह में 121 मेडल बांटे गए। इसमें से 98 मेडल बेटियों के खाते में आए, 85 स्वर्ण और 13 रजत। छात्रों को 23 मेडल मिले, 20 स्वर्ण और तीन रजत पदक। 84वें दीक्षांत समारोह में भी छात्राओें ने बाजी मारी थी। 125 मेडल में से 106 छात्राओं को और 19 छात्रों को मिले थे। यानि पदक पाने वालों में 85 फीसदी छात्राएं और 15 फीसदी छात्र रहे थे।
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दीक्षांत समारोह में छात्राएं
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83वें दीक्षांत समारोह में पदक पाने वालों में 83 फीसदी छात्राएं और 17 फीसदी छात्र रहे। 85वें दीक्षांत समारोह में पीएचडी और एमफिल की उपाधि पाने वालों में भी छात्राएं आगे रहीं। पीएचडी में 33 छात्रों को उपाधि मिली तो छात्राओं की संख्या 38 रही। एमफिल में 50 छात्रों को तो 77 छात्राओं को उपाधि मिली।
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आकांक्षा सिंह को सबसे अधिक 11 पदक मिले
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11 मेडल पाने वाली डॉ. आकांक्षा हरियाणा के जिले महेंद्रगढ़ के कनीना कस्बे की रहने वाली हैं। गोल्डन गर्ल कहती हैं कि सेना, पुलिस, राजनीति, खेलों में महिलाओं का दबदबा है। वे हिमालय की चोटी से अंतरिक्ष तक पहुंच चुकी हैं। फिर भी बेटियां बोझ समझी जाती हैं। यह जानकर बहुत दुख होता है कि अभी भी बेटियों को कोख में मारा जा रहा है।
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मां व अन्य परिजन के साथ आकांक्षा सिंह
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उन्होंने कहा कि हरियाणा इसकी सजा भुगत रहा है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर उन्होंने डॉक्टरों से अपील की, ऐसे घिनौने खेल में कतई शामिल न हों। आकांक्षा ने बताया कि वह परिवार में पहली डॉक्टर हैं और सर्जन बनना चाहती हैं।
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खुशी जाहिर करतीं आकांक्षा सिंह
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गोल्डन गर्ल आकांक्षा सिंह के पिता सत्यवीर सिंह और मां सरला सिंह दोनों ही सरकारी शिक्षक हैं। 11 मेडल पाने वाली आकांक्षा ने पढ़ाई के बारे में कहा कि पहले सपने देखो फिर उसे पूरा करने में रात-दिन एक कर दो।
दूसरे स्थान पर रहीं आगरा के महर्षिपुरम कॉलोनी निवासी मनिंदर कौर ने बताया कि पहला मेडल उन्हें कक्षा 12 में मिला था। उसी दिन से उनके हौसले को सही मायने में पंख मिले। तब ही ठान लिया कि अब हर क्लास में मेडल लाना है। आरबीएस कॉलेज में प्रवेश लिया और जमकर पढ़ाई की। पढ़ाई के लिए नोट्स बनातीं। इसमें निरंतरता रखी। इंटरनेट का भी पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया।
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पिता मलकीत सिंह के साथ मनिंदर कौर
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उन्होंने बताया कि उनकी लगन देखकर पिता मलकीत सिंह और मां कुलवंत कौर ने भी पूरा सहयोग किया। यही वजह रही कि उनको पांच मेडल मिले हैं। भविष्य में वह प्रोफेसर बनना चाहती हैं। पढ़ाई की तैयारी के बारे में बस उन्होंने यही कहा कि पहले अपनी प्राथमिकता तय कर लें, फिर उसके लिए जी-जान से जुट जाएं, सफलता निश्चित है।
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पांच स्वर्ण पदक पाकर दूसरे स्थान पर रहीं चंचल
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मथुरा में जन्मभूमि रोड स्थित जगन्नाथपुरी निवासी चंचल ऐसी बेटी हैं, जिस पर कोई भी पिता गर्व कर सकता है। सुरक्षा गार्ड पिता लक्ष्मण सिंह और गृहणी रेशम देवी की इस होनहार संतान ने अभावों की जमीन पर सोना उगाकर दिखा दिया। पांच स्वर्ण पदक के साथ विश्वद्यिालय में संयुक्त रूप से दूसरा स्थान पाया है।
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गोल्डन गर्ल्स
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चंचल ने बताया कि परिवार में दो बहन और एक भाई है। पिता की नौकरी से परिवार और पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा था। चंचल ने बताया कि पिता ने बड़ी बहन को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया। उनको भी पूरी छूट दे दी। पढ़ाई बीच में न छूट जाए, इसके लिए वो कई बार ओवरटाइम करते लेकिन कभी इसका एहसास नहीं होने देते। बस, यही कहते बेटी तुम कुछ बन जाओगी तो सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। गले में पांच मेडल देखेंगे तो निश्चित ही उनके लिए बड़ा दिन होगा। चंचल ने हिंदी से एमए किया है, प्रोफेसर बनना चाहती हैं।
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शिवम शर्मा को मिले तीन पदक
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तीन मेडल पाने वाले एसएन मेडिकल कॉलेज के छात्र शिवम शर्मा का कहना है कि मेहनत के साथ धैर्य रखना बेहद जरूरी है। जरूरी नहीं कि पहली-दूसरी बार में ही सफलता मिल जाए। कहा कि कॅरियर का चुनाव करें, फिर उसे ही प्राथमिकता समझ कर तैयारी करें। अपनी सफलता में डॉ. अनुपम शर्मा और मां डॉ. अंजू शर्मा का बड़ा योगदान मानते हैं। शिवम फिजीशियन बनना चाहते हैं।
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हैदराबाद के डॉ. रहीम खान
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हैदराबाद के डॉ. रहीम खान 52 साल की उम्र में डीलिट की उपाधि पाई। वह मौलाना आजाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर की है। यहां से विश्वविद्यालय हिंदी में डीलिट की है। इन्होंने बताया कि 25 साल से वह अध्यापन कार्य कर रहे हैं और पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती है।
वैजयंती ट्राफी भेंट करतीं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, साथ में उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा व कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित
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गंगाधर शास्त्री हिंदी वाद-विवाद प्रतियोगिता (दृष्टि कुलश्रेष्ठ-भावना सिकरवार) और पन्नालाल ट्राफी अंग्रेजी वाद-विवाद प्रतियोगिता (दृष्टि कुलश्रेष्ठ-लक्ष्य दंडौतिया) पर सेंट जोंस कॉलेज ने कब्जा जमाया। गांधी वाक प्रतियोगिता में केआर गर्ल्स पीजी कॉलेज मथुरा की पूजा सारस्वत और गांधी विचार गोष्ठी की विजेता बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय कही जूही तिवारी रही।