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अपराजिता: अपनों ने छोड़ा...खुद तय की सफलता की डगर, शहर में बनाई पहचान, पढ़िए इनकी कहानी

Fri, 25 Jun 2021 11:58 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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अपराजिता: ऐसी महिलाओं की कहानी जिन्होंने अपनी दम पर पाई सफलता - फोटो : अमर उजाला
परिस्थितियों के कारण अपनों से अलग होना पड़ा। जीवनसाथी से अलग होने के बाद लगा कि जिंदगी ठहर गई है लेकिन अपराजिताएं खड़ी हुईं और खुद सफलता की डगर तय की। संघर्ष में शिक्षा सहारा बनी। तलाक के बाद इन महिलाओं ने अपना काम शुरू किया। आत्मनिर्भर बनने के दृढ़संकल्प ने रास्ते की बाधाओं को दूर कर दिया। दो महिलाएं ब्यूटी पार्लर की संचालिका हैं तो एक ने अपना ब्यूटी स्टूडियो खोला हुआ है। एक अपराजिता स्कूल की प्रधानाचार्य हैं।
 
माता-पिता ने दिया साथ, कभी हार नहीं मानी
जीवनसाथी से अलग होने का दर्द कोई दूसरा नहीं समझ सकता। टूट जाते हैं। क्या करेंगे, कैसे करेंगे...सूझता नहीं है। मुश्किलें आईं लेकिन मैंने हार नहीं मानी। दयालबाग निवासी मोना खूबनानी ने इन शब्दों में अपना संघर्ष अमर उजाला से साझा किया।
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अपराजिता: लाजपत कुंज निवासी स्वाती - फोटो : अमर उजाला
बेटी की जिम्मेदारी थी...मैं उठकर खड़ी हो गई
जिंदगी में एक पल ऐसा आया जब लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है। बेटी की जिम्मेदारी और परिवार के साथ ने सहारा दिया। मैं उठकर खड़ी हो गई...यह कहते-कहते लाजपत कुंज निवासी स्वाती यादों में खो गईं। कुछ देर तक चुप रहीं...फिर भावुक स्वर में बोलीं कि मुझे जिंदगी के नए सफर की शुरुआत करनी थी। बाधाएं अधिक थीं और रास्ते कम। मैंने मेकअप का कोर्स किया। निर्णय माफिक आया। आज मेरा पास खुद का स्टूडियो है। जीवन में जो कुछ भी हुआ, उसका मुझे अफसोस है। पर इस बात को लेकर हमेशा तसल्ली रही कि मैं कभी गलत नहीं थी। भगवान की जो इच्छा थी, उसे मैंने स्वीकार किया। 
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दयालबाग निवासी मोना खूबनानी - फोटो : अमर उजाला
दयालबाग निवासी मोना खूबनानी ने बताया कि जीवन में हार नहीं मानने की मजबूती माता-पिता ने दी। बुरे दौर में वो मेरे साथ ढाल बनकर खड़े रहे। उनके साथ ने मन को पक्का किया। ठान लिया खुद का काम शुरू करने का। हेयर एंड मेकअप आर्टिस्ट का काम शुरू किया। दोस्तों के सहयोग और बड़ों के आशीर्वाद से आज लोग मुझे सफल नारी बताते हैं, तो काफी खुशी मिलती है। 

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आवास विकास कॉलोनी निवासी पारुल - फोटो : अमर उजाला
बेटा-बेटी की जिम्मेदारी ने दिया संघर्ष का साहस
आवास विकास कॉलोनी निवासी पारुल ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। बोलीं कि जो कुछ भी हुआ, उसे मैं भूल चुकी हूं। याद करने से कोई फायदा इसलिए नहीं है क्योंकि गुजरे समय की यादें परेशान करने लगती हैं। जब हम अलग हुए तो निराश थी। कई बार ऐसा लगा कि कहीं चली जाऊं। लेकिन बेटा और बेटी को जब देखती तो हिम्मत मिलती। लगता था कि मुझे इनका सहारा बनना है। इस जिम्मेदारी से आगे बढ़ने का साहस मिला। मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स किया। अब यह ही मेरे परिवार के पालन पोषण का जरिया है। दो महीने पहले अप्रैल में अपनी मेहनत के बल पर बेटी की शादी भी कर दी।
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आकांक्षा रैना - फोटो : अमर उजाला
शिक्षा बनी सहारा, अब मैं आत्मनिर्भर हूं
दयालबाग निवासी आकांक्षा रैना का कहना है कि कठिनाई के समय में अच्छी शिक्षा उनका सहारा बनी। बोलीं कि जिंदगी में खुशियां ही खुशियां थीं। एक बुरा दौर आया और हम अलग हुए। मेरे परिवार ने मुझे सहारा दिया। कभी भी हार न मानने का हौसला दिया। कुछ समय तक चुप रहने के बाद आकांक्षा ने कहा कि शिक्षा मेरी ताकत बनी। मैं प्ले ग्रुप स्कूल में प्रधानाचार्य बनी। अब आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हूं। मेरा मकसद है कि बेटे को अच्छी शिक्षा दूं। शिक्षा आपको संघर्ष की ताकत देती है।

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