वैसे तो चमत्कार और रहस्य के कई किस्से आपने पढ़े और सुने होंगे, इन किस्सो में कुछ किस्से ऐसे भी होते जिन पर आंख बंद कर विश्वास कर लेना इतना आसान नही होता। लेकिन आज भी कई ऐसे मंदिर है, जिनके चमत्कार के आगे विज्ञान ने भी घुटने टेक दिए ,साथ इन मंदिरों के किस्से सुनकर आप भी चमत्कारों पर विश्वास करने पर मजबूर हो जाएंगे.....
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यहां दीपक जलाने को नहीं चाहिए तेल-घी, जल ही काफी है
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गड़ियाघाट मंदिर
- फोटो : amar ujala
आमतौर पर हम सभी ने सुना है कि मंदिर में देवी-देवता के सामने घी या फिर तेल के दीपक जलाने से भगवान जल्द प्रसन्न होते है। लेकिन क्या आप जानते है कि हमारे देश में ही एक ऐसा मंदिर है जहां पर घी, तेल के दीपक नहीं बल्कि पानी का दीपक जलता है। पानी का नाम सुनते ही शायद आप सभी चौक सकते है कि ऐसा कैसे हो सकता है। जो जल दीपक को बुझा देता है उससे दीपक की ज्योत कैसे जल सकती है। लेकिन गड़ियाघाट वाली माता के मंदिर में आपको घी, तेल की जरुरत नहीं पड़ती।
माता के चमत्कारों से पूर्ण यह भारत के दिल मध्य प्रदेश में नलखेड़ा से 15 किमी दूर गांव गाड़िया के पास कालीसिंध नदीं के किनारे स्थित है। इस मंदिर में होने वाले चमत्कार को देखकर किसी भी व्यक्ति का सिर सहज ही श्रद्धाभाव से झुक जाएगा। इस मंदिर में दीपक जलाने के लिए किसी घी या तेल की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि दीपक को जलाने हेतु पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इस मंदिर में पानी का दीपक जलता है।
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नदी के पानी से जलता है मां के लिए दीपक
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गड़ियाघाट मंदिर
- फोटो : amar ujala
मान्यता है कि बरसात के मौसम में मंदिर नदी के पानी में पूरी तरह डूब जाता है, तब इस ज्योत को बुझा दिया जाता है। नदी का पानी कम हो जाने पर शारदीय नवरात्र के पहले यह ज्योत फिर से पुजारी द्वारा जला दी जाती है, जो अगली बरसात तक जलती रहती है। यहां आस्था और विश्वास के आगे न केवल मानव बल्कि विज्ञान भी नतमस्तक नजर आता है।
यहां मूर्ति बदलती है रूप, सुबह कन्या तो शाम में बुजुर्ग अवस्था
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घारी देवी मंदिर
- फोटो : amar ujala
दुनियाभर में अध्यात्म औऱ आस्था के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड राज्य में वैसे तो अनगिनत मंदिर हैं, लेकिन यहां एक ऐसा मंदिर भी है, जो इस राज्य की रक्षा करता है। इस मंदिर में प्रतिदिन आद्याशक्ति तीन रूपों में भक्तों को दिखाई देती है। वह प्रात:काल कन्या, दोपहर में युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार भयंकर बाढ़ में कालीमठ मंदिर बह गया था। लेकिन धारी देवी की प्रतिमा एक चट्टान से सटी होने के कारण धारो गांव में बह कर आ गई थी। गांववालों को धारी देवी की ईश्वरीय आवाज सुनाई दी थी कि उनकी प्रतिमा को वहीं स्थापित किया जाए। जिसके बाद गांव वालों ने माता के मंदिर की स्थापना वहीं कर दी।
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पूरी दुनिया ने देखा माता धारी देवी का गुस्सा
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घारी देवी मंदिर
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मान्यता है कि इस मंदिर में माँ काली की प्रतिमा द्वापर युग से ही स्थापित है। कालीमठ एवं काली मठों में माँ काली की प्रतिमा क्रोध मुद्रा में है, परन्तु धारी देवी मंदिर में काली की प्रतिमा शांत मुद्रा में स्थित है। हालांकि शांत मुद्रा में दिखने वाली धारी माता के गुस्से को दुनिया ने उस वक्त देखा, जब एकाएक देवभूमि पानी में समा गई थी। उत्तराखंड के गढ़वाल में रहने वालों का मानना है कि यह विपदा माता धारी देवी के प्रकोप के कारण आई। कहते हैं कि इस प्राचीन मंदिर से माता की मूर्ति के हटाने के कुछ घंटे बाद ही केदारनाथ में तबाही का मंजर आया और सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गए।
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इंडोनेशिया के इस मंदिर में मिला 'अमृत कलश'
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कंडी सुकुह
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मुस्लिम बाहुल्य देश इंडोनेशिया में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां पर अमृत कलश होने का दावा किया जाता है। ये मंदिर मुख्य जावा आइलैंड के बीचोंबीच है। इस मंदिर को कंड़ी सुकुह कहा जाता है। मान्यता है कि यह वही कलश है जो समुद्र मंथन के दौरान निकला था। कहते हैं कि इस कलश में रखा द्रव्य हजारों साल से मौजूद है। मान्यता है कि यह अमृत है जो हजारों साल से नहीं सूखा। इस कलश में पारदर्शी शिवलिंग होने की बात कही जाती है। इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत का आदिपर्व भी अंकित है।
इस कलश का पता तब लगा, जब 2016 में पुरातत्व विभाग मरम्मत का कार्य करवा रहा था। पुरातत्व विभााग को इस मंदिर की दीवार की नींव से तांबे का कलश मिला, जिसमें एक पारदर्शी शिवलिंग जुड़ा हुआ था। इसके भीतर एक खास लिक्विड भरा हुआ था। शोध में पाया गया कि तांबे के बर्तन से इसकी बड़ी बारीक जुड़ाई की गई है ताकि इसे खोला न जा सके। सबसे हैरानी की बात यह है कि ये जिस दीवार में ये पाया गया, उस पर समुद्र मंथन की नक्काशी मौजूद है। इस कलश की कॉर्बन डेटिंग लगभग बारहवीं सदी की बताई जाती है।