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...और जब जमीन से फूट पड़ी दूध की धारा

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जमीन से दूध की धारा फूटी और देव मार्कंडेय ऋषि ने इसे ग्रहण किया। देवता ने धरती मां के आंचल में समाकर दूध का सेवन किया। आइए आपको बताते हैं कहां हुआ ये सब। इनपुट: रितेश गुलेरिया, फोटो: अजय कुमार
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हिमाचल के कुल्लू जिले के मकराड में देव आस्था के आगे फिर हजारों सिर नतमस्तक हुए। जमीन से दूध की धारा फूटी और देव मार्कंडेय ऋषि ने इसे ग्रहण किया। देवता ने धरती मां के आंचल में समाकर दूध का सेवन किया और सैकड़ों लोगों के साथ मंदिर में पहुंचे। देवता अपने जन्मदिन पर करीब सवा बारह बजे मंदिर से बाहर निकले। देवता के स्वागत के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ साथ थी।
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मंदिर से करीब आधा किमी दूरी पर स्थित ब्यास और गोमती नदी के संगम स्थल पर देवता ने स्नान किया। इसके बाद देवता अपनी मां से मिलने उस खेत की ओर निकल पड़े जहां सैकड़ों साल पहले आज के ही दिन (बैसाखी) उनका मोहरा मिला था।

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देवता के कारदार जीवन प्रकाश शर्मा का कहते है कि सैकड़ों साल पहले बैसाखी के ही दिन खेत से देवता का मोहरा मिला था। इसके बाद देवता मार्कंडेय ऋषि की यहां स्थापना हुई थी। उन्होंने कहा कि देव मान्यता के अनुसार आज भी खेत से दूध की धार निकलती है और देवता दूध पीते हैं। पहले यहां लोगों को भी दूध निकलता हुआ दिखता था। अब केवल गूर को ही यह धारा दिखती है। जब तक देवता दूध ग्रहण नहीं करते हैं वे मंदिर वापस नहीं जाते हैं।
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क्या है स्नान का महत्व- मान्यता के कि बैसाखी के दौरान देवता के साथ जो भी व्यक्ति संगम स्थल में स्नान करते करता है। उसे कई रोगों से छुटकारा मिल जाता है। भूत पिशाच सहित दूसरे कष्ट भी दूर हो जाते हैं।
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देव स्नान से गंगाजल बन जाता है संगम का पानी- देवता के कारदार कहते हैं कि संगम स्थल में देवता के स्नान के साथ ही नदी का पानी गंगा जल के समान पवित्र हो जाता है। लोग इस जल को अपने घरों में ले जाते हैं। यह पानी गंगा जल की तरह सालों तक खराब नहीं होता।
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देव स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने भी आस्था की डुबकी लगाई।

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जमीन में समाकर मां का दूध पीते देव मार्कंडेय ऋषि।

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देवता ने ब्यास और गोमती के संगम स्थल पर स्नान किया।
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देवता के साथ चले गांव के लोग।
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