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इस चमत्कारी शिवलिंग के आगे हार गया था लंकापति रावण

Fri, 19 Aug 2016 09:36 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, शिमला
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शक्ति के दम पर तीनों लोकों पर अपना दबदबा कायम करने वाला लंकापति रावण अपनी एक गलती की वजह से इस चमत्कारी शिवलिंग के आगे हार गया था। यही नहीं उसकी एक इच्छा भी अधूरी रह गई थी। आइए जानते हैं इस शिवलिंग की पूरी कहानी-
शक्ति के दम पर तीनों लोकों पर अपना दबदबा कायम करने वाला लंकापति रावण अपनी एक गलती की वजह से इस चमत्कारी शिवलिंग के आगे हार गया था। यही नहीं उसकी एक इच्छा भी अधूरी रह गई थी। आइए जानते हैं इस शिवलिंग की पूरी कहानी-
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कहते हैं कि रावण तीनों लोकों पर अपना राज कायम करने के लिए कैलाश पर्वत पर तपस्या कर रहा था। भगवान शिव को खुश करने के लिए इसने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। आखिरकार जब भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुए तो रावण ने अपने 10 सिर हवन में काटकर चढ़ा दिए थे।
कहते हैं कि रावण तीनों लोकों पर अपना राज कायम करने के लिए कैलाश पर्वत पर तपस्या कर रहा था। भगवान शिव को खुश करने के लिए इसने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। आखिरकार जब भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुए तो रावण ने अपने 10 सिर हवन में काटकर चढ़ा दिए थे।
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इसके बाद भगवान भोलेनाथ रावण की तपस्या से खुश हुए और वरदान देने के लिए प्रकट हुए। भोलेनाथ ने रावण के सारे सिर उसे वापस दे दिए। यही नहीं भोलेनाथ ने रावण को असीम शक्तियां भी दी जिससे वह परम शक्तिशाली बन गया था।
इसके बाद भगवान भोलेनाथ रावण की तपस्या से खुश हुए और वरदान देने के लिए प्रकट हुए। भोलेनाथ ने रावण के सारे सिर उसे वापस दे दिए। यही नहीं भोलेनाथ ने रावण को असीम शक्तियां भी दी जिससे वह परम शक्तिशाली बन गया था।

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इसी दौरान रावण ने अपनी एक और इच्छा जताई। उसने कहा कि वह भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता है। ‌भगवान शिव ने उसकी ये इच्छा भी पूरी की और शिवलिंग में परिवर्तित हो गए। मगर उन्होंने कहा कि वह जहां मंदिर बनवाएगा वहीं, इस शिवलिंग को जमीन पर रखे।
इसी दौरान रावण ने अपनी एक और इच्छा जताई। उसने कहा कि वह भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता है। ‌भगवान शिव ने उसकी ये इच्छा भी पूरी की और शिवलिंग में परिवर्तित हो गए। मगर उन्होंने कहा कि वह जहां मंदिर बनवाएगा वहीं, इस शिवलिंग को जमीन पर रखे।
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रावण भी कैलाश से लंका के लिए चल पड़ा। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। वह अभी हिमालय से गुजर ही रहा था कि रास्ते में उसे लघुशंका जाना पड़ा। वह बैजनाथ में रुका और यहां भेड़ें चरा रहे एक गडरिए को देखा।
रावण भी कैलाश से लंका के लिए चल पड़ा। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। वह अभी हिमालय से गुजर ही रहा था कि रास्ते में उसे लघुशंका जाना पड़ा। वह बैजनाथ में रुका और यहां भेड़ें चरा रहे एक गडरिए को देखा।
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उसने चमत्कारी शिवलिंग गडरिए को दे दी और खुद लघुशंका करने चला गया। क्योंकि शिवलिंग भारी था इसलिए गडरिए ने इसे थोड़ी देर तक संभाले रखा मगर बाद में इसे जमीन पर रख दिया।
उसने चमत्कारी शिवलिंग गडरिए को दे दी और खुद लघुशंका करने चला गया। क्योंकि शिवलिंग भारी था इसलिए गडरिए ने इसे थोड़ी देर तक संभाले रखा मगर बाद में इसे जमीन पर रख दिया।
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जब रावण थोड़ी देर में वापस लौटा तो उसने देखा कि गडरिए ने शिवलिंग जमीन पर रख दी है। वह उसे उठाने लगा लेकिन उठा नहीं पाया। काफी कोशिश करने के बाद भी यह चमत्कारी शिवलिंग जस से तस नहीं हुआ। रावण शिव महिमा को जान गया और वहीं मंदिर का निर्माण करवा दिया।
जब रावण थोड़ी देर में वापस लौटा तो उसने देखा कि गडरिए ने शिवलिंग जमीन पर रख दी है। वह उसे उठाने लगा लेकिन उठा नहीं पाया। काफी कोशिश करने के बाद भी यह चमत्कारी शिवलिंग जस से तस नहीं हुआ। रावण शिव महिमा को जान गया और वहीं मंदिर का निर्माण करवा दिया।

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यह मंदिर हिमाचल के कांगड़ा ‌स्थित बैजनाथ में है। ये मंदिर आज भी त्रेता युग की यादों को समेटे हुए हैं।
यह मंदिर हिमाचल के कांगड़ा ‌स्थित बैजनाथ में है। ये मंदिर आज भी त्रेता युग की यादों को समेटे हुए हैं।

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स्‍थानीय लोग आज भी यहां आने वाले सैलानियों को यह कथा सुनाते हैं। अब इस मंदिर का निर्माण नगोरा शैली में किया गया है। हर साल इस भव्य मंदिर में देश विदेश से श्रद्घालु पहुंचते हैं। यहां आने पर सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।
स्‍थानीय लोग आज भी यहां आने वाले सैलानियों को यह कथा सुनाते हैं। अब इस मंदिर का निर्माण नगोरा शैली में किया गया है। हर साल इस भव्य मंदिर में देश विदेश से श्रद्घालु पहुंचते हैं। यहां आने पर सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।
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हर साल राज्य स्तरीय शिवरात्रि मेला भी यहां होता है। (सभी फोटो सोशल मीडिया से)
हर साल राज्य स्तरीय शिवरात्रि मेला भी यहां होता है।
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