आकर्षित उपवेजा
- फोटो : अमर उजाला
कविता
कुछ दोस्त बुहत याद आते हैं
इन पुरानी तस्वीरों में ,
ये मेरे साथ खड़े नजर आते हैं,
मुड़के देखूं मैं अगर,
ताे कुछ दाेस्त बहुत याद आते हैं।।
उनके साथ बिताए पल,
मेरे दिल में घर कर जाते हैं,
मुड़के देखूं मैं अगर,
ताे कुछ दाेस्त बहुत याद आते हैं।।
लाेगों के लिए कैसे भी थे,
मेरे लिए वाे खास थे,
न जाने ऐसा क्या था उनमें,
जाे मेरे दिल के इतने पास थे।।
वो हंसना, लड़ना-झगड़ना,
वाे साथ खेलना याद आता है,
वाे दाेस्त, वाे क्लास,
वाे आखिरी बैंच याद आता है।
पर हमसे ज्यादा वाे बैंच शायद,
हमारे टीचर काे भाता था,
तभी हर सवाल का जवाब,
हमसे ही पूछा जाता था।।
अब जवाब न आने पर,
हम क्या ही कर सकते थे,
बस मन ही मन साेचते कि,
यार किसी और से भी पूछ सकते थे,
ऐसे हंसते-खेलते कई माैसम ढल गए,
हमारी दाेस्ती के बीज, एक पेड़ में बदल गए,
फिर कुछ रास्ते जिंदगी के,
माेड़ने पड़ गए,
जिनके साथ हंसता-खेलता था,
वाे दोस्त छोड़ने पड़ गए,
अब बस तस्वीराें में ही हम साथ,
मुस्कुराते नजर आते,
मुड़के देखूं मैं अगर,
ताे कुछ दाेस्त बहुत याद आते हैं।।
-आकर्षित उपवेजा (शिमला)