...कुश्ती का इनाम है पांच सौ रुपये। हे...कोई मर्दानी, जो बबली को टक्कर दे सके। उसे धूल चटा सके। बबली, हट्टी-कट्टी और तंदरुस्त लड़की, पहली कुश्ती में राधा से पटखनी खा चुकी थी। इसलिए इस बार जीतने के लिए हर दांव आजमाने को तैयार थी। रेफरी ने चुनौती फिर से दोहराई...। भीड़ में सुगबुगाहटें हुईं, पर कोई सामने नहीं आया। फिर से ललकारा जाता, सामान्य कद-काठी की महिला सन्नो रावत भीड़ चीरती हुई सामने आ खड़ी हुई और हाथ खड़ा कर दिया।
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तस्वीरें: इनके हौंसले हैं बेहद बुलंद, देती हैं कड़ी टक्कर
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...सन्नो, ताकत में बबली से कहीं कमतर नहीं थी। लिहाजा बराबरी की लड़ाई की उम्मीद में दर्शकों की तालियां तेजी से गड़गड़ाने लगीं। ...कुश्ती शुरू हुई और जैसे-जैसे दांव-पेंच आजमाए जाते, दर्शकों का उत्साह भी बढ़ता जाता। पर, बबली ने ऐसे दांव दिखाए कि सन्नो महज एक मिनट में ही चित हो गईं...।
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यह कमेंटरी है अहिमामऊ की ऐतिहासिक महिला कुश्ती ‘हापा’ की, जो पिछले 200 सालों से नाग पंचमी के अगले दिन आयोजित होती आ रही है। गुरुवार को जब महिलाओं के दंगल का आयोजन हुआ तो गांव में मेले सी रौनक रही। एक के बाद एक कई कुश्तियां हुईं और चारदीवारी में रहने वाली महिलाओं ने अपने कौशल का परिचय दिया।
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दंगल शुरू होने से पहले गांव की महिलाएं ढोलक बजाती हुईं मैदान में पहुंची और मां भवानी की पूजा की। कजरी, सुहाग और भक्ति रस में डूबे लोकगीत गाए और रस्म अदायगी के बाद दमखम दिखाने के लिए मैदान में उतरीं। सबसे पहले मैदान में जोरआजमाइश के लिए राधा व बबली आईं, जिसमें राधा ने बबली को पटखनी दे दी और ईनाम की साड़ी प्राप्त की।
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इसके बाद विनय कुमारी व शांति, राधा व राजकुमारी सहित तमाम महिलाओं ने जोरआजमाइश की। रेफरी की भूमिका में समाजवादी पार्टी से जुड़ी शांति देवी रहीं, जो दंगल का संचालन भी कर रही थीं। दंगल में जीतने व हारने, दोनों प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया।
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...पहले पटखनी दी, फिर ईनाम की साड़ी हापा की खासियत है कि यहां महिलाएं सभी गिले-शिकवे मिटाकर एक-दूसरे की ताकत बनने का संकल्प भी लेती हैं। यही कारण है कि जब पूर्व प्रधान विनय कुमारी व शांति देवी के बीच कुश्ती हुई तो दोनों ने भरपूर दमखम दिखाया। विनय जीत गईं और जीतने के बाद ईनाम में मिली अपनी साड़ी उपहारस्वरूप हारने वाली शांति देवी को दे दी।
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दीवारों व छतों से चिपके रहे पुरुष हापा महिलाओं का दंगल है, इसलिए यहां पुरुषों व बच्चों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। पुरुषों का प्रवेश न हो सके, इसके लिए पुलिस भी लगाई गई थीतस्वीरें: इनके हौंसले हैं बेहद बुलंद, देती हैं कड़ी टक्कर। लेकिन दंगल के जोशोखरोश की आवाजें मैदान से बाहर खड़े लोगों तक आ रही थीं, जिससे उनकी उत्सुकता बढ़ रही थी। इसलिए दंगल की एक झलक पाने के लिए पुरुष व बच्चे दीवारों से चिपके व छतों पर खड़े नजर आए।
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गौरवशाली इतिहास... हापा की शुरूआत करीब 200 साल पहले बेगम नूरजहां व कमरजहां ने करवाई थी। उस वक्त अहिमामऊ एक छोटी सी रियासत हुआ करती थी। पुरुषवादी मानसिकता से दबी कुचली महिलाओं की स्थिति सुधारने के उद्देश्य से दंगल शुरू करवाया गया। ताकि वे मानसिक व शारीरिक रूप से मजबूत बन सकें। गीत-संगीत के साथ ही मनोरंजन केअन्य साधन भी हापा से समय-समय पर जुड़ते रहे, जिससे इसका रोमांच साल दर साल बढ़ता रहा।
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‘हापा’ से टूट रहा पुरुषों का वर्चस्व दंगल में जोर-आजमाइश करने वाली रामकली रावत मानती हैं कि हापा के कारण ही गांव में पुरुषों का वर्चस्व टूट रहा है। अब महिलाओं पर उनकी हुकूमत नहीं चलती। वहीं गंगा देवी ने कोफ्त जताया कि कुश्ती की ऐतिहासिक परम्परा को आगे बढ़ाने का जिम्मा जिन लड़कियों केकंधों पर है, वे इसे देखना पसंद करती हैं। लेकिन इसमें शामिल होना नहीं। बुजुर्ग औरतों के भरोसे ही दंगल हो रहे हैं।
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22 वर्षों तक अखाड़े में दमखम दिखाने वाली रामकली बताती हैं कि तीन साल पहले बायां हाथ टूट गया था। इससे पहले किसी की हिम्मत नहीं होती थी सामने टिकने की।
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मेले से बढ़ी दंगल की रंगत एक ओर जहां महिलाएं दंगल में शक्ति प्रदर्शन कर रही थीं, वहीं दूसरी ओर गांव में मेले की रौनक रही। जहां पुरुषों, बच्चों, युवाओं संग हर कोई लुत्फ उठा रहा था। मेले में झूलों संग चाट-बतासों व आइसक्रीम के ठेले लगे थे। जहां लोगों की भीड़ देर रात तक जुटी रही।