अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देश के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अपने गीतों और कविताओं से हजारों श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रखा। इस दौरान देश के कोने-कोने से ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी संख्या में दर्शकों ने घर बैठे काव्य रस का आनंद उठाया। कवियों ने न सिर्फ हिंदी के वैभव और समृद्धि को अपनी रचनाओं में पिरोया बल्कि उनमें हिंदी के तिरस्कार की पीड़ा भी नजर आई। तभी तो देश के प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने अपने गीत के माध्यम से देशवासियों से हिंदी के उत्थान के लिए आह्वान करते हुए गीत पढ़ा- ‘बदले परिवेश में, कबीरा के देश में, स्वर्णिम प्रभात करो रे... कोई तो हिंदी की बात करो रे...’। इसके अलावा युवा गीतकार प्रियांशु गजेंद्र, अवधी भाषा के विख्यात कवि डॉ. अशोक अज्ञानी, हिंदी मंचों के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राहुल अवस्थी, ओज के कवि अभय निर्भीक, शृंगार की कवयित्री शिखा श्रीवास्तव और युवा कवि प्रख्यात मिश्रा ने अपने काव्यपाठ से श्रोताओं का मनोरंजन करने के साथ ही देश और हिंदी के हाल को बड़ी संजीदगी से बयां किया। संचालन डॉ. राहुल अवस्थी ने किया। इस दौरान सभी रचनाकारों ने अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान को मातृभाषा के उत्थान में किया जा रहा अभूतपूर्व व सराहनीय कार्य बताया।
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डॉ विष्णु सक्सेना
- फोटो : amar ujala
खूब सराहे गए डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत
ऑनलाइन आयोजन के दौरान रविवार को डॉ. विष्णु सक्सेना का अलग ही अंदाज देखने को मिला। अपने प्रेम गीतों के लिए मशहूर डॉ. विष्णु ने जब हिंदी पर गीत पढ़ा तो दर्शकों की ओर से उन्हें खूब वाहवाही मिली। दरअसल उन्होंने बिल्कुल नए गीत सुनाए जो इससे पहले मंचों पर नहीं सुने गए थे। इसीलिए काव्य प्रेमियों को और भी ज्यादा आनंद आया। उन्होंने शृंगार का गीत पढ़ा-
तन और मन हैं पास बहुत फिर, सोच-सोच में क्यों दूरी है
हम बदले तो कहा बेवफा, वे बदले तो मजबूरी है।
इसके बाद उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस गीत को आगे बढ़ाते हुए पढ़ा-
गंगा के तट बैठ रेत के, बना-बना के महल गिराए।
उसने हमको, हमने उसको जाने कितने सपन दिखाए।
झूठ-मूठ को मांग भरी थी, हाथ अभी तक सिन्दूरी है।
हिंदी गीत से लूटी वाहवाही
बदले परिवेश में, कबीरा के देश में
स्वर्णिम प्रभात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
जन्म दिया जिसने, हां जिसने ही पाला
हां हां उसी ने खिलाया निवाला
दिल के अरमानों पर, अनगिन अहसानों पर
कुछ दृष्टिपात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
हिंदी की बिंदी को मस्तक लगाओ
हिंदी की वीणा को खुलकर बजाओ
बहुगुण विचारों की, सुगठित संस्कारों की
अच्छी शुरुआत करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
खूब सराहे गए डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत
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डॉ राहुल अवस्थी
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हिंदी को सब में खपने दो, हिंदी में सबको खपने दो...
संचालन कर रहे डॉ. राहुल अवस्थी ने अपने काव्य पाठ में बड़ी खूबसूरती और बेबाकी के साथ हिंदी की उन्नति का रास्ता बताया। उन्होंने पढ़ा-
हिंदी को सब में खपने दो, हिंदी में सबको खपने दो, हिंदी को अपनी आंखें दो, हिंदी को अपने सपने दो। हिंदी को भीषण संघर्षों की ज्वालाओं में तपने दो, हिंदी कठजीवी है, इसको अपने आप पनपने दो।
डॉ. राहुल अवस्थी ने हिंदी भाषा का बखान करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में पढ़ा-
जो कहते हैं हिंदी भाषा अपनी किस्मत से हेठी है, वो सुन लें, इसके बावजूद ये जेठी थी, ये जेठी है, इसने वाणी के चंदन में अपनी मर्याद लपेटी है, ये संस्कृत की बेटी की बेटी की बेटी की बेटी है। इसके बाद उन्होंने अपनी कविता के जरिए यह भी बताया कि केवल सरकारी तंत्र पर भरोसा कर हिंदी का विकास संभव नहीं है। उन्होंने पढ़ा-
सरकारी जोर-जबरदस्ती से तुष्ट नहीं हो सकती है, आयोगों की पहरेदारी से पुष्ट नहीं हो सकती है।
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शिखा श्रीवास्तव
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हम नहीं मीर के, गालिब के घराने वाले...
सरस्वती वंदना से काव्य पाठ की शुरुआत करने वाली युवा कवयित्री शिखा श्रीवास्तव ने नारी मन और देश के प्रति अपनी भावना को कुछ इस तरह से पंक्तियों में बयां किया -
मैं नारी हूं, नारी का सम्मान समेटे हूं, मातु शारदे ने जो दिया वरदान समेटे हूं। मुझमें गीतों गजलों का एक झरना बहता है, लेकिन दिल में जन गण मन का गान समेटे हूं।
इसके बाद उन्होंने पढ़ा- हर एक सपना सच होगा ये आस जरूरी है, सीता हो तो राम के संग वनवास जरूरी है।
शिखा ने अंत में एक गजल के साथ अपने जज्बात बयां किए। उन्होंने पढ़ा- हम नहीं इश्क का मेयआर गिराने वाले। कुछ कहें, कुछ भी कहें, हमको जमाने वाले। पुरअसर होते हैं अशआर हमारे भी ‘शिखा’, हम नहीं मीर के,गालिब के घराने वाले।
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डॉ अशोक अज्ञानी
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आपनि भाषा आपनि बानी अम्मा हैं...
गांव की सोंधी मिट्टी की महक और अपनत्व भरी अवधी भाषा को अपनी कविताओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक अज्ञानी ने मातृभाषा को अपनी मां का स्वरूप देते हुए जब विलक्षण कविता पढ़ी तो श्रोता झूम उठे। उन्होंने पढ़ा- आपनि भाषा, आपनि बानी अम्मा हैं, भूली-बिसरी कथा किहानी अम्मा हैं। मुफति म माखन खॉंय घरैया सबै, मगर नाचैं दिनु भरि एकु मथानी अम्मा हैं। पूरे घर का भारु उठाये खोपड़ी पर जस ट्राली मा परी कमानी अम्मा हैं। ना मानों तो गांव-गली की गड़ही हैं, मानों तो गंगा महरानी अम्मा हैं।
इसके बाद उन्होंने अवधी की एक और रचना से श्रोताओं को आनंद का रसास्वादन कराते हुए पढ़ा- अनुभाव, विभाव प्रभाव करैं, रस-राशि तबै रसियावत है।
जब नैन मिलैं तब चैन मिलै, उर तो उर का उरझावत है।
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अभय निर्भीक
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आओ हम सब भारत घूमें, इसकी पावन रज को चूमें...
कवि अभय निर्भीक ने काव्य पाठ के दौरान अपनी विस्तृत रचना में पूरे भारत को एक सूत्र में पिरो दिया। इसमें जहां भारत की अखंडता परिलक्षित हुई तो वहीं हमारी पुरातन संस्कृति, महापुरुषों और हिंदी के पुरोधाओं का संगम भी देखने को मिला। उन्होंने पढ़ा-
आओ हम सब भारत घूमें, इसकी पावन रज को चूमें मस्जिद से गुरुद्वारे तक, नटखट से नंद दुलारे तक
सागर से चलो हिमालय तक, गिरजा से पुण्य शिवालय तक, ध्यान, प्रार्थना और वुजू में
आओ हम सब भारत घूमें।
इसके बाद उन्होंने कुछ इस अंदाज में सूर,तुलसी से लेकर नीरज तक कवियों की गाथा को अपनी कविता में पिरोया- सूरदास की सगुण भक्ति तक, चलें कृष्ण की प्रेम शक्ति तक, गिरिधर में मिलते रतनों तक, मीराबाई के भजनों तक, नीरज जी के प्रेम गीत तक, बंध बंध में बँधी प्रीत तक, तुलसी जी की कविताई तक मानस की हर चौपाई तक, रहिमन की हिंदी सेवा तक, छंद सवैये से दोहा तक, भारत जी से युग युगाधि तक, चलें राम की जल समाधि तक, मिल जुलकर मस्ती में झूमें, आओ हम सब भारत घूमें
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प्रख्यात मिश्रा
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या तो ये तिरंगा सीमा पार लहराएगा...
ओज के युवा कवि प्रख्यात मिश्रा ने अपनी कविताओं से देशभक्ति का रंग भरा। उन्होेंने जहां एक ओर सैनिकों के साहस को अपनी रचना में उतारा तो वहीं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने देश की सरहद की सीमा पर तैनात सैनिक की इच्छा को कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया- कोटि-कोटि कट जाऊं, इंच-इंच बंट जाऊं, लाड़ला न पुरखों की नाक को कटवाएगा, या तो ये तिरंगा लपेट आऊंगा मां, या तो ये तिरंगा सीमा पार लहराएगा।
इसके अलावा उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के विराट व्यक्तित्व का बखान करते हुए पढ़ा- माना राम जन्मभूमि के मुद्दे पर हर काम जरूरी है।
मगर अयोध्या से पहले इस दिल में राम जरूरी है।
नागफनियों की गली में फूल का व्यापार मेरा...
बाराबंकी के गीतकार प्रियांशु गजेंद्र ने अपने सवैये और गीत से श्रोताओं का मन जीत लिया। उन्होंने सुनाया- गहन गिरवर सघन वन में, बहकती पुरवा पवन में, लहकते धरती गगन में, महकने दो प्यार मेरा, नागफनियों की गली में फूल का व्यापार मेरा
इसके बाद प्रियांशु ने हिंदी भाषा के उत्थान प्रति अपनी आश्वस्ति जताते हुए पढ़ा-
भाषा भारत राष्ट्र की कविकुल की सुखधाम, यह तुलसी की राम है मीरा की घनश्याम। मीरा की घनश्याम, मेरे जीवन की साथी, दुलहन इसका रूप, जगत भर है बाराती। कह गजेन्द्र कविराय, रखो यह मन में आशा, एक दिन सारा विश्व, पढ़ेगा हिंदी भाषा।
वहीं उन्होंने होली के रंगों में प्रेम के रंगों को घोलते हुए कुछ इस तरह से अपने जज्बात बयां किए- रंग से रंग मिले इतने, खुद रंग में डूब नहा गयी होली, प्रेम पुरातन जाग पड़ा फिर प्रेम की प्यास जगा गयी होली, साजन हैं जिनके घर में उनके हर शोक भगा गयी होली, दूर बसे जिनके उनके बस देह में आग लगा गयी होली।