पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से गहरा नाता है। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे वाजपेयी वर्ष 1957 में जनसंघ के टिकट पर बलरामपुर संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद बने थे। तराई के पिछड़े क्षेत्र बलरामपुर में चुनाव-प्रचार का इनका अंदाज आज भी याद किया जाता है। जीप में धक्का लगाने से लेकर घोड़ा पर चढ़कर जनसभा तक पहुंचने वाले वाजपेयी जी यहां ले लोगों के जेहन में बसे हैं।
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atal bihari vajpayee
- फोटो : amar ujala
अटल जी के सहयोगी रहे 90 वर्षीय लाटबक्श सिंह ये यादें साझा करते हुए कि भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि करीब 50 साइकिलों के जत्थे के साथ अटल जी गांव-गांव व घर-घर जाकर लोगों से वोट मांगते थे। यही नहीं, पूरा संसदीय क्षेत्र उनका घर था। रात में प्रचार करते वक्त जिस गांव में रात हो जाती अटल जी वहीं ठहर जाते और सुबह होते ही वहीं से फिर चुनाव प्रचार में निकल पड़ते। पगडंडी व कच्चे रास्तों पर चलने वाला यह युवा जनसंघी एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा इस बात का आभास उस वक्त किसी को नहीं था।
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अटल जी का बलरामपुर में राजनीतिक सफर 1957 से शुरु होकर 1971 तक चला। इस दौरान वह 1957 तथा 1967 में लोकसभा चुनाव जीते तथा वर्ष 1962 में उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी सुभद्रा जोशी से हारना पड़ा था।
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जीप में खुद लगाते थे धक्का
उनके सहयोगी तथा तुलसीपुर विधानसभा से जनसंघ के विधायक रहे सुखदेव प्रसाद अटल जी के साथ किए गए चुनाव प्रचार का बखान करते हुए आज भी भाव-विभोर हो उठते हैं। सुखदेव ने बताया कि 1957 में चुनाव प्रचार के लिए स्थानीय जनसंघियो ने उन्हे एक जीप मुहैया कराई थी। जीप की हालत जर्जर थी जो कुछ देर चलने के बाद रुक जाती थी। अटल जी खुद उम्मीदवार होने के बावजूद अपने वाहन में धक्का लगाकर स्टार्ट कराते थे। यही नहीं, अटल जी ने बैलगाड़ी से भी अपना चुनाव प्रचार किया।
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घोड़ी चढ़ पहुंचे अटल
बात 1957 के लोकसभा चुनाव की है। गौरा चौराहे के पास ग्राम चौखड़ा में अटल जी चुनाव प्रचार कर रात्रि विश्राम कर रहे थे। सवेरे उन्हें उतरौला तथा रेहरा बाजार में चुनावी जनसभा को संबोधित करना था। रात में मूसलाधार बारिश के कारण कच्ची सड़कों पर जलभराव हो गया। चालक ने कीचड़ में वाहन ले जाने में असमर्थता जताई। सवेरे लोगों ने जनसभा में अटज ली को जाने के लिए पालकी का इंतजाम किया। अटल जी ने पालकी में जाने से मना कर दिया। सवेरे एक परिचित के यहां से एक घोड़ी मंगाई। घोड़ी से ही अटल जी उतरौला तथा रेहराबाजार की जनसभाओं को संबोधित करने के बाद जनसंपर्क भी किया।
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मैं ही हूं अटल बिहारी
-अटल जी वक्त और जुबान के बहुत पाबंद थे। उन्हें पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 1957 में बलरामपुर पहुंचना था। अटल जी बलरामपुर रेलवे स्टेशन पर रात 10 बजे पहुंचे। उनको लेने स्टेशन पहुंचे जनसंघ के जिला महामंत्री राम दुलारे पाठक अटल जी को ढूंढ नहीं पाए। ट्रेन के डिब्बों व स्टेशन पर ढूंढने के बाद पाठक जी यह कहकर स्टेशन से बाहर निकलने लगे कि शायद अटल जी इस ट्रेन से नहीं आए हैं। इसी बीच पीछे से एक आवाज ने पाठक को चौंका दिया ' पाठक जी कहां घूम रहे हैं और किसे ढूंढ रहे हैं।' पाठक जी ने सरल लहजे में कहा कि अटल जी आने वाले थे लेकिन शायद वह नहीं आए। यह सुनते आवाज देने वाला व्यक्ति हंस पड़ा और कहा कि पाठक जी मैं ही हूं अटल बिहारी वाजपेयी। यह सुनकर पाठक जी चौंके और झेंपे भी। महसूस हुआ कि वह खुद अटल को नहीं पहचान सके जबकि अटल ने उन्हें पहचान लिया।
कौवापुर व काला नमक बहुत पसंद करते थे अटल बिहारी
बलरामपुर जिले में स्थित कौवापुर रेलवे स्टेशन तथा काला नमक चावल की खुशबू अटल जी को बहुत पसंद थी। बलरामपुर छोड़ने के बाद जब-जब अटल जी ने यहां चुनावी जनसभा की उनके भाषण में कौवापुर व कालानमक का जिक्र जरूर आता था। बलरामपुर की धरती तथा यहां के लोगों के प्रति उनका विशेष लगाव था। प्रधानमंत्री बनने पर बलरामपुर से पहुंचने वाले लोगों का अटल से बेहद ख्याल रखते थे।