प्रतीकात्मक तस्वीर
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शर्मिंदगी
जुमना बताती हैं, "उस रात मुझे खून नहीं निकला और तब मेरे पति ने रात के सन्नाटे को चीरने वाली चीख के साथ कहा कि खून नहीं निकला। उसने मुझे इतनी भद्दी-भद्दी गालियां दी, जो मैं अपनी जुबान से निकाल भी नहीं सकती। उसकी आंखें अंगारों की तरह दहक रही थीं, जो मुझे किसी भी वक्त खाक कर सकती थीं।"
करीब एक घंटे तक जुमना भयंकर सदमे में थीं। उनकी जुबान से एक भी लफ्ज नहीं निकला। उन्होंने सुबह तक भी इंतजार नहीं किया और उनका कौमार्य परीक्षण करने के लिए उसी रात एक डॉक्टर के पास गए, जो उनके कुंवारी होने की तस्दीक कर सके। जुमना बताती हैं, "मुझे याद है कि वो डॉक्टर मुझे इस तरह सांत्वना दे रहा था,जैसे वो मेरा पिता हो। वो मेरे पति को उसकी करतूत के लिए फटकार लगा रहा था।"
जुमना को अगले कई सालों तक अपने उस शौहर के साथ रहना पड़ा, जिसने उसे सबके सामने जलील किया था। क्योंकि न जुमना का परिवार और न ही उनके आस-पास के लोग, तलाक के लिए उनका साथ देने को तैयार हुए। न तो उस रात किसी ने जुमना का समर्थन किया और न ही अगले बीस साल की शादीशुदा जिंदगी के दौरान।
20 साल और चार बच्चे होने के बाद भी जुमना उस जलालत को भूल नहीं पाई हैं। जैसे ही वो अपने बच्चों के साथ ब्रसेल्स पहुंची, उन्होंने अपनी शादी पर पूर्ण विराम लगा दिया ताकि वो अपने शौहर और उस समाज से बदला ले सके, जिसने उन्हें नीचा दिखाया था।
जुमना कहती हैं कि ब्रसेल्स की जिंदगी उन्हें और उनके बच्चों के लिए बेहतर है। अब वो दोबारा शादी नहीं करना चाहतीं। इसके बजाय वो अपनी पढ़ाई का सपना पूरा करना चाहती हैं, जिससे उन्हें पहले महरूम कर दिया गया था। वो अपने बच्चों को वैसी तरबीयत देना चाहती हैं, जो खुद उन्हें नहीं मिल सकी।
जुमना बताती हैं, "मैं अब खुश हूं, क्योंकि मैं अपनी दो बेटियों को भी अपने साथ यहां ला सकी। मैंने अपने शौहर को सिर्फ तलाक नहीं दिया। मैंने उस मआशरे को भी अलविदा कह दिया, जिसने मेरे साथ इंसाफ नहीं किया।"